उजड़ा हुआ था गुलशन दयानन्द ने सँवारा
जय जय ऋषि तुम्हारा ॥
वो रात धन्य आई नूतन प्रभात लाई
टंकारा की धारा पर रवि किरण जगमगाई
इक नन्हीं सी किरण से फैला प्रकाश सारा ॥ जय जय ऋषि ॥
जो खेलने के दिन थे आँसू बने खिलौने
शंकर का मूलशंकर चला सच्चे शिव का होने
ममता की चाह छोड़ के घर से चला दुलारा ॥ जय जय ऋषि ॥
ऋषि को तो ना फिकर थी काँटों भरी डगर की
परवाह न थी खारों के तपते हुए सफर की
बर्फी के पर्वतों पे जीवन कठिन गुजारा ॥ जय जय ऋषि !!
घर सबके जल रहे थे नफरत में पल रहे थे
भाई के खूँ के प्यासे भाई ही बन रहे थे
अच्छा हुआ जो हमने देखा नहीं नजारा ॥ जय जय ऋषि ॥
मर्यादा मनु की छूटी हर बात थी अनूठी
सब दे रहे थे जग को धर्मों की आस झूठी
बिगड़े हुए समाज को दयानन्द ने सुधारा ॥ जय जय ऋषि ॥
नारा स्वतन्त्रता का ऋषि ने प्रथम लगाया
विधवा अनाथ गौओं को अपमान से बचाया
पत्थर की चोट खा के ऋषि लक्ष्य से ना हारा ॥ जय जय ऋषि ॥
वैदिक धर्म का प्यारा युग का चमकता तारा
दयानन्द सा जहाँ में नहीं दूसरा पधारा
जो गया तो रो दिया नगर कूचा गली चौबारा ॥ जय जय ऋषि ॥










