उजड़ा हुआ था गुलशन दयानन्द ने सँवारा

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उजड़ा हुआ था गुलशन दयानन्द ने सँवारा

तर्ज : गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दुबारा

उजड़ा हुआ था गुलशन दयानन्द ने सँवारा
जय जय ऋषि तुम्हारा ॥

वो रात धन्य आई नूतन प्रभात लाई

टंकारा की धारा पर रवि किरण जगमगाई

इक नन्हीं सी किरण से फैला प्रकाश सारा ॥ जय जय ऋषि ॥

जो खेलने के दिन थे आँसू बने खिलौने

शंकर का मूलशंकर चला सच्चे शिव का होने

ममता की चाह छोड़ के घर से चला दुलारा ॥ जय जय ऋषि ॥

ऋषि को तो ना फिकर थी काँटों भरी डगर की

परवाह न थी खारों के तपते हुए सफर की

बर्फी के पर्वतों पे जीवन कठिन गुजारा ॥ जय जय ऋषि !!

घर सबके जल रहे थे नफरत में पल रहे थे

भाई के खूँ के प्यासे भाई ही बन रहे थे

अच्छा हुआ जो हमने देखा नहीं नजारा ॥ जय जय ऋषि ॥

मर्यादा मनु की छूटी हर बात थी अनूठी
सब दे रहे थे जग को धर्मों की आस झूठी
बिगड़े हुए समाज को दयानन्द ने सुधारा ॥ जय जय ऋषि ॥

नारा स्वतन्त्रता का ऋषि ने प्रथम लगाया
विधवा अनाथ गौओं को अपमान से बचाया
पत्थर की चोट खा के ऋषि लक्ष्य से ना हारा ॥ जय जय ऋषि ॥

वैदिक धर्म का प्यारा युग का चमकता तारा

दयानन्द सा जहाँ में नहीं दूसरा पधारा
जो गया तो रो दिया नगर कूचा गली चौबारा ॥ जय जय ऋषि ॥