उद्धार का मार्ग

0
10

अ॒ग्निमिन्या॑ने॒ मन॑सा धिय॑ सचेत॒ मर्त्यः ।

अ॒ग्निमधे वि॒वस्व॑भिः॥ ऋग. (८.१०२.२२ साम. १६

तर्जः भजमन भजमन सदा हरि का नाम

यज्ञकर यज्ञकर कर्म तू कर निष्काम
उसकी दया से बन जाएगा तू भी अग्नि-समान
॥ यज्ञकर ॥

जो भी प्रतिदिन अग्नि जलाकर अग्निहोत्र रचाये
अग्नि जैसे गुण जीवन में यज्ञ के साथ जगाये
आत्म ज्योति फिर क्यूँ न जागे क्यों न बने तू महान ?
॥ यज्ञ कर ॥

बाह्ययज्ञ कर के अन्दर का यज्ञ तू कर ले धारण
बाह्ययज्ञ से, शतगुण बेहतर अन्तर्मन का क्षालन
कर प्रदीप्त इस आत्मग्नि को कर मेधावी काम ॥
॥ यज्ञकर ॥

आत्म निरीक्षण आत्मिक चिन्तन सद्विचारवत कर्म
जाप धारणा ध्यान समाधि है आत्मा का धर्म
तमो निवारक ज्ञान-रश्मियाँ बनेंगी तारक त्राण॥
॥ यज्ञकर॥

सूर्य रश्मियों से संसार की ज्योति होतीं प्रबुद्ध
सत्यज्ञान-उपदेष्टा करते वेद-सूर्य से शुद्ध
कर लूंगा मैं प्रतिदिन उज्जवल, कर्म मनोरथ ज्ञान॥
॥ यज्ञकर ॥

(निष्काम) कामना रहित। (शतुगण) सी गुना। (क्षालन) शुद्ध करना। (मेधावी) तीव्र
बुद्धिमान, धारणा शक्ति वाला, विद्वान, पंडित। (तम) अन्धकार। (प्रबुद्ध) चैतन्य, खिला
हुआ। (त्राण) रक्षक। (उपदेष्टा) उपदेश करने वाला। (रश्मि) किरण।