त्याग सके ना प्रभु को कोई आत्मा का परमात्मा वो ही

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त्याग सके ना प्रभु को कोई आत्मा का परमात्मा वो ही

तर्ज : गोड तुझा त्या स्वप्ना मधुनी

त्याग सके ना प्रभु को कोई आत्मा का परमात्मा वो ही

आँखों को पुतली ना दिखे पास है फिर भी आँखों ही के

आत्मा के सन्निकट है ईश्वर, दर्शन दे तत्काल….दयानिधे ॥
त्याग सके ना ॥

देखना चाहे सदि परमेश्वर गहन उतर जा काव्य के भीतर

प्रभु से गुणी कौन है बेहतर महिमा उसकी विशाल….दयानिधे !!

त्याग सके ना ॥

दृष्यकाव्य का जग है द्योतक, ज्ञानी जन उसके अनुमोदक

महाकाव्य की वेद है पुस्तक, कवि प्रभु हैं कृपाल…दयानिधे॥
त्याग सके ना ॥

देख सृष्टि प्रभु के दर्शन कर आत्मा को विश्वात्मा में धर

आत्मविभोर करे प्रभु दर्शन हृदय जगे स्वर ताल…..दयानिधे ॥
त्याग सके ना ॥

(काव्य)कवि के गुणों से युक्त (सन्निकट) अत्यन्त पास (अनुमोदक) समर्थक (दृष्यमान) दिखनेवाला.