अ॒यम॒ग्निः सुवीर्यस्पेशें महः सौभगस्य ।
राय ईशे स्वपत्यस्य गोमत ईशें वृत्रुहर्थानाम् ॥ ऋ. ३.१६.१ साम. ६०
तर्ज : प्रति दिनम ये दक्षिणम मरिनर कुनायदेय
प्रतिनियम से प्रतिदिवन् तू वीर्यशक्ति रखना
है उपाय तू अग्नि देव की नित उपासना करना
आत्मिक चिन्तन मनन संयम प्राणायाम करना ॥ ॥ प्रतिनियम से।
ओ मेरी जान, तेरा सौभाग्य रहेगा कीर्तित
तू हर स्थिति में होगा गर परिमार्जित
अग्नि देव की यज्ञ से कर उपासना
यज्ञ की सुघड़ वृत्तियों की रहे शुद्ध कामना।
कभी यथार्थ कर्म में फल की इच्छित वृत्ति में ना बहको
मिले हर्ष, मिले दर्द।
मिले हार, जीत हानि-लाभ, उपरति में रहना॥ ॥ प्रतिनियम से।
यज्ञ में लग लो, बाधायें जितनी आयें सह लो
दुष्ट रोकेंगे, मगर हिम्मत के साथ बढ़ लो
इन्द्र-वृत्र की ये लड़ाई सदा चली है
दृढ़मन यज्ञकाम तो देता सदा बलि है।
पिया है वेदरूपी, कामधेनु के गौ का दूध तुमने
मिले हर्ष, मिले दर्द
मिले हार-जीत हानि-लाभ उपरति में रहना। ॥ प्रतिनियम से॥
यज्ञ तुम्हारा, तुम्हारा फल भी, मेरा क्या है? कहो ना!
फल मेरे बेफल, सफल निष्फलता को करना
मन के मोहना! मेरा फल देव! तुम ही हो हे
देव! फाग खेलना हो तो तुम फाग खेल लो
तेरे इस फाग में, धन त्याग का, कभी रख ना लूँ मैं दाता
मिले हर्ष, मिले दर्द
मिले हार-जीत हानि-लाभ उपरति में रहना। ॥ प्रतिनियम से ॥
(प्रतिनियम) प्रत्येक के लिये एक नियम, (त्वदीय) तुम्हारी। (प्रतिदिवन्) प्रतिदिन। (गोविन्द)
ब्रह्मज्ञानी। (वीर्यशक्ति) शुभ मंगल दायक शक्ति। (कीर्तित) यशस्वी। (परिमार्जित) शुद्ध
किया हुआ। (सुबड़) सुन्दर, निपुण। (उपरति) त्याग, वैराग्य। (वृत्र) शत्रु। (इन्द्र) देवताओं
का राजा। (बलि) भेंट। (कामधेनु) सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाली। (गी) गााय (वेदरूपी)। (फाग) होली।










