तुम ढूँढते हो जिसको मन्दिर में, शिवालों में
तुम ढूँढते हो जिसको
मन्दिर में, शिवालों में
वो तुम को मिल सके ना
ऐसे कभी जंजालों में
कभी गङ्गा नहाते हो
कभी यमुना नहाते हो
कहीं जा सर झुकाते हो
कहीं माया लुटाते हो
कैसे तुम फँस रहे हो
बेकार के बबालों में
नहीं तुम चैन पाते हो
कहीं तीरथों में जाते हो
सितम पशुओं पे ढाते हो
बलि उनकी चढ़ाते हो
करते हो जुल्म फँस कर
तुम ढोंगियों की चालों में
रात दिन बन के अन्यायी
करते पापों की कमाई
चल रहे तुम गलत राही
सम्भल जाओ बहन भाई
मिलना है गर प्रभु से
आओ ज्ञान के उजालों में
मन के मन्दिर को सजा कर
ज्ञान की ज्योत जला कर
ओ३म् का ध्यान लगा कर
सुधारक नित बैठा कर
भगवन् के होंगे दर्शन
तुमको ये शुद्ध ख़यालों में
तुम ढूँढते हो जिसको
मन्दिर में, शिवालों में
वो तुम को मिल सके ना
ऐसे कभी जंजालों में










