तू धर्म से प्रकट हो

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जातः परेण धर्मणा यत् सवृद्धिः सहाभुवः ।!

पिता यत्कश्यपस्याग्निः श्रद्धामाता मनुः कवि ॥

साम. ८०

तर्जः तामर नूलिन पिलैन मेडिन तुट्ट विलिक्युम

जाकर देखा वेद-सुपथ पर जागा अन्तर्मन
लग गया धारणा ध्यान समाधि में ही मेरा मन
मैने से जाना कि तू ही धर्माधार है तेरे शासन में चलता ये संसार है
इसलिए पाते तेरी शरण
और करते हैं जीवन में धर्मा चरण ॥ जाकर देखा…

वाणियाँ उसकी तो वेद बोले
आत्माओं के अन्तर्पट वो खोले
सत्य अहिंसा संयम तप के
वेदों ने सारे रहस्य खोले
वेद-श्रुति-रस में मदमस्त होके
क्यों ना तू हो जाए सम्पन्न ॥ हो ऽऽऽ जाकर देखा..

ईश्वर की चाहत से राहत मिली
श्रावक बना खिल गई हृदय-कली
चिन्तन मनन निदिध्यासन से
सूक्ष्मदर्शी साधक बन गए कवि
दृष्टा में हूँ किन्तु दृष्टि है ईश्वर
कण कणमें हैं उसके दर्शन ॥ हो 55 जाकर देखा…

ज्ञान ज्योति से करो अग्रणी
करते संरक्षण पिता हो तुम्ही
श्रद्धा बनी माता ममतामयी
सत्य के पथ पर वो लेके चली
‘ना वेदविन्मनुते तं बृहन्तम्’
ऐसा ही मानू मैं भगवन् ॥ हो ऽऽ जाकर देखा…

ना वेद विन्मजुते तं बृहन्तम् जो वेदज्ञ नहीं वो उसे जानता नहीं, श्रावक श्रोता, छात्र,

वेदश्रुति वेद का सुनना या ज्ञान होना, कवि विचारवान, प्रतिभाशाली,अग्रणी आगे ले जाने वाला,

संरक्षण पूर्ण रक्षा