बलिदान और उपेक्षा की कहानी 🔥🇮🇳
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कई क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन कुछ नाम इतिहास में उतने चर्चित नहीं हुए, जितने होने चाहिए थे। ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी थे अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह, जिनका जीवन देशभक्ति, संघर्ष और बलिदान की अनुपम गाथा है।
प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी चेतना ✊
जन्म: 22 जनवरी 1892
स्थान: गाँव नबादा, जनपद शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश
परिवार: पिता – ठाकुर जंगी सिंह, माता – कौशल्या देवी
ठाकुर रोशन सिंह का पूरा परिवार आर्य समाज से प्रेरित था और महर्षि दयानंद सरस्वती के विचारों को मानता था। इसी संस्कार ने उनमें बचपन से ही देशभक्ति और क्रांतिकारी विचारों का संचार किया।
असहयोग आंदोलन और ब्रिटिश सरकार से टकराव 🏹
गांधी जी के नेतृत्व में 1920 में चले असहयोग आंदोलन में ठाकुर रोशन सिंह ने उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली जिले में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। बरेली गोलीकांड के दौरान उन्होंने बहादुरी से पुलिस की रायफल छीनकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, जिससे अंग्रेजी पुलिस को उल्टे पाँव भागना पड़ा।
परिणामस्वरूप, उन्हें गिरफ्तार कर दो वर्षों की सश्रम कारावास की सजा दी गई और बरेली सेंट्रल जेल में रखा गया।
क्रांतिकारी संगठन और बमरौली एक्शन 🔥
1922 में गांधीजी ने चौरी-चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया, जिससे युवाओं में गहरा असंतोष फैल गया। इसी दौरान शाहजहाँपुर आर्य समाज मंदिर में ठाकुर रोशन सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, सुरेशचंद्र भट्टाचार्य और अन्य क्रांतिकारियों ने एक बड़ा क्रांतिकारी संगठन बनाने की योजना बनाई।
धन जुटाने के लिए “एक्शन” (डकैती) की रणनीति अपनाई गई।
➡️ 25 दिसंबर 1924 को पीलीभीत के बमरौली गाँव में एक अंग्रेज समर्थक व्यापारी के घर डकैती डाली गई। इस दौरान जब मोहनलाल नामक व्यक्ति ने विरोध किया तो ठाकुर रोशन सिंह ने एक ही गोली में उसे ढेर कर दिया।
बाद में, यही घटना उनके लिए मृत्यु का कारण बनी।
काकोरी कांड और गिरफ्तारी 🚂
9 अगस्त 1925 को जब काकोरी कांड हुआ, तो इस घटना में ठाकुर रोशन सिंह सीधे तौर पर शामिल नहीं थे। लेकिन अंग्रेजी सरकार ने बमरौली डकैती का बहाना बनाकर उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया।
असल में इस डकैती में ठाकुर साहब की उम्र के एक क्रांतिकारी केशव चक्रवर्ती (बंगाल अनुशीलन समिति के सदस्य) शामिल थे, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी तलाश करना उचित नहीं समझा और सजा रोशन सिंह को दिलवा दी।
फाँसी की सजा और अंतिम समय ⚖️
ब्रिटिश सरकार ने ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा सुनाई।
अंतिम रात (26 दिसंबर 1927) को:
✅ वेद-श्लोकों का पाठ किया।
✅ पूरी रात ईश्वर-भजन में बिताई।
✅ प्रातः स्नान-ध्यान के बाद गीता का पाठ किया।
27 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद की नैनी जेल में फाँसी दी गई।
जब उन्हें फाँसी के तख्ते की ओर ले जाया गया, तो उन्होंने “वंदे मातरम्” का जयघोष किया और गीता हाथ में लेकर “ॐ विश्वानि देव सवितुर दुरितानि परासुव…” वेद मंत्र का जाप किया।
परिवार की दुर्दशा और उपेक्षा 😞
ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान के बाद उनका परिवार पूरी तरह से बेसहारा हो गया।
➡️ उनकी बेटी की शादी के लिए धन नहीं था।
➡️ कोई भी उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया।
➡️ प्रसिद्ध पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने मदद की और उनकी बेटी का कन्यादान भी किया।
➡️ इसके कारण कांग्रेस के भीतर उन्हें विरोध भी झेलना पड़ा।
आज का भारत और शहीदों की उपेक्षा 😡
आज के समय में ठाकुर रोशन सिंह के वंशज बेहद खराब स्थिति में हैं।
✅ उनकी विधवा प्रपौत्री इंदु सिंह मनरेगा मजदूर हैं।
✅ उनकी झोपड़ी जला दी गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
✅ आज भी शहीदों के परिवार सम्मान और न्याय के लिए तरसते हैं।
यह देश का दुर्भाग्य है कि जिसने अंग्रेजों से टकराकर स्वतंत्रता दिलाई, उसके परिवार को दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
यादगार और श्रद्धांजलि 🏛️
इलाहाबाद की नैनी मलाका जेल में उनके बलिदान को याद करने के लिए एक आवक्ष प्रतिमा स्थापित की गई।
प्रतिमा के नीचे अंकित अमर पंक्तियाँ:
💬 “जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन!
वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं।”
हमारा कर्तव्य है कि उनके बलिदान को याद रखें और शहीदों के परिवारों को सम्मान दें।
🙏 शत-शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि! 🙏
🇮🇳 जय हिंद! जय भारत!
विस्तृत जीवन परिचय

काकोरी काण्ड के शहीद क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जनपद में कस्बा फतेहगंज से 10 किलोमीटर दूर स्थित गाँव नबादा में 22 जनवरी 1892 को ठाकुर जंगी सिंह एवं कौशल्या देवी के पुत्र के रूप में हुआ था। पूरा परिवार आर्य समाज से अनुप्राणित था और महर्षि दयानंद में अगाध श्रद्धा रखता था और इसी ने ठाकुर रोशन सिंह में देश के प्रति समर्पण का भाव उत्पन्न किया। पाँच भाई-बहनों में सबसे बडे रोशन सिंह ने असहयोग आन्दोलन में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली जिले के ग्रामीण क्षेत्र में अद्भुत योगदान दिया था। यही नहीं, बरेली में हुए गोली-काण्ड में एक पुलिस वाले की रायफल छीनकर जबर्दस्त फायरिंग शुरू कर दी थी जिसके कारण हमलावर पुलिस को उल्टे पाँव भागना पडा। बाद में इन पर मुकदमा चला और सेण्ट्रल जेल बरेली में दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा काटनी पडी।
गान्धी जी द्वारा सन 1922 में हुए चौरी चौरा काण्ड के विरोध स्वरूप असहयोग आन्दोलन वापस ले लिये जाने पर पूरे हिन्दुस्तान में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। इसी प्रकरण से उद्वेलित होकर ठाकुर साहब ने भी राजेन्द्र नाथ लाहिडी़, रामदुलारे त्रिवेदी व सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य आदि के साथ शाहजहाँपुर शहर के आर्य समाज पहुँच कर राम प्रसाद बिस्मिल से गम्भीर मन्त्रणा की जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित कोई बहुत बड़ा क्रान्तिकारी संगठन बनाने की रणनीति तय हुई। इसी रणनीति के तहत ठाकुर रोशनसिंह को संगठन में शामिल किया गया था क्योंकि इस दर्जे के पक्के निशानेबाज थे कि उडती हुई चिडिया को भी मार गिरा सकते थे।
संगठन को सबसे अधिक आवश्यकता थी पैसे की और इसके लिए रास्ता तय हुआ डकैती का जिसे संगठन की ओर से नाम दिया गया-एक्शन। ऐक्शन के नाम पर पहली डकैती पीलीभीत जिले के एक गाँव बमरौली में 25 दिसम्बर 1924 को क्रिसमस के दिन अंग्रेजों के एक पिट्ठू व्यापारी बल्देव प्रसाद के यहाँ डाली गयी जिसमें 4000 रुपये और कुछ सोने-चाँदी के जेवरात क्रान्तिकारियों के हाथ लगे। परन्तु मोहनलाल पहलवान नाम का एक आदमी, जिसने डकैतों को ललकारा था, ठाकुर रोशन सिंह की रायफल से निकली एक ही गोली में ढेर हो गया और यही बाद में रोशन सिंह की फाँसी की सजा का कारण बना।
इस संगठन ने अगला निशाना बनाया सरकारी खजाने को। 9 अगस्त 1925 को काकोरी स्टेशन के पास जो सरकारी खजाना लूटा गया था, वास्तव में उसमें ठाकुर रोशन सिंह शामिल नहीं थे, किन्तु इन्हीं की आयु (36 वर्ष) के केशव चक्रवर्ती (छद्म नाम), अवश्य शामिल थे जो बंगाल की अनुशीलन समिति के सदस्य थे, पर पकडे गए रोशन सिंह और चूँकि वो बमरौली डकैती में शामिल थे ही और इनके खिलाफ सारे साक्ष्य भी मिल गये थे अत: पुलिस ने सारी शक्ति ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा दिलवाने में ही लगा दी और केशव चक्रवर्ती को खो़जने का कोई प्रयास ही नहीं किया। खानापूरी के बाद उन्हें फाँसी की सजा दे दी गयी।
अपना अंत समय जान उन्होंने अपनी माँ के नाम एक भावुक पत्र लिखा जो आज भी इलाहबाद के संग्रहालय में देखा जा सकता है। ये मार्मिक पत्र ठाकुर रोशन सिंह की विचारधारा से तो अवगत कराता ही है, साथ ही अपने पीछे भरा पूरा परिवार अनाथ छोड़ कर जा रहे व्यक्ति के दुःख को भी व्यक्त करता है। इलाहाबाद में नैनी स्थित मलाका जेल में फाँसी से पहली रात ठाकुर साहब कुछ घण्टे सोये फिर देर रात से ही ईश्वर-भजन करते रहे। प्रात:काल शौचादि से निवृत्त हो यथानियम स्नान ध्यान किया कुछ देर गीता-पाठ के बाद गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फाँसी घर की ओर चल दिये। फाँसी के फन्दे को चूमा फिर जोर से तीन वार वन्दे मातरम् का उद्घोष किया और वेद-मन्त्र – “ओ३म् विश्वानि देव सवितुर दुरितानि परासुव यद भद्रम तन्नासुव” – का जाप करते हुए 27 दिसम्बर 1927 को फन्दे से झूल गये।
ठाकुर साहब की मृत्यु के बाद उनके परिवार को अपार कष्ट भोगने पड़े और उनका परिवार एक एक दाने का मोहताज हो गया। उनकी विवाह योग्य बेटी के विवाह में धनाभाव के कारण अडचने आने लगी और कोई भी हाथ उनकी सहायता के लिए आगे नहीं बढ़ा। ऐसे में प्रसिद्द पत्रकार और प्रताप के सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने उनके परिवार की सहायता की और उनकी बेटी का कन्यादान भी किया। हालांकि एक आतंकवादी (गाँधी जी की कांग्रेस के दृष्टिकोण से) के परिवार की सहायता करने के लिए विद्यार्थी जी को कांग्रेस के अपने सहयोगियों का कोपभाजन बनना पड़ा पर ये उनका बडप्पन ही था कि उन्होंने कभी भी क्रांतिकारियों को अलग नहीं माना और सदैव उनकी हरसंभव सहायता की।
इलाहाबाद की नैनी स्थित मलाका जेल के फाँसी घर के सामने अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की आवक्ष प्रतिमा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान का उल्लेख करते हुए लगायी गयी है। वर्तमान समय में इस स्थान पर अब एक मेडिकल कालेज स्थापित हो चुका है। मूर्ति के नीचे ठाकुर साहब की कही गयी ये पंक्तियाँ भी अंकित हैं – जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन! वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं। शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि। (ये देश का दुर्भाग्य है कि शाहजहांपुर के थाना सिंधौली के पैना गांव में रहने वाली अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की विधवा प्रपौत्री इंदु सिंह, जो नरेगा मजदूर है और अपने नाबालिग बच्चों के पेट भरने के लिए खेतों में मजदूरी करती है, की कुछ समय पहले अराजक तत्वों ने पिटाई की और फायरिंग करते हुए झोपड़ी में आग लगा कर सारी गृहस्थी ख़ाक कर गए पर कई बार शिकायत करने पर भी अभियुक्तों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुयी। सच में ये देश अपने शहीदों का सम्मान करना नहीं जानता।)
साभार___विशाल अग्रवाल










