पाहि नौ अग्ने पायुभिरज॑स्त्रै कृत प्रिये सद॑न॒ आ शुशुक्वान् ।
मा ते॑ भ॒यं ज॑रितारं यविष्ठ नूनं विदुन्मा पुरं संहस्वः
॥ ऋ. १.१८६.४
तर्जः मळयिल निरयुम पुड़ पोले
हे ईश्वर तुम अग्नि हो, अग्रगन्ता हो मार्गदर्शक हो।
अग्नि समान प्रकाशक हो, उन्नायक हो ज्योतिर्मय हो
तुम पतितों को लेते उबार, डूबनहारों के तारक हो
हे ईश्वर…
पाप के पङ्क में फँसा हुआ भी, तुझ प्रेरक से पाये सबक
जिसके राखन हारे तुम हो, गिरि से भी गिर कर जाए बच
आऽऽ, तुम हो करुण दयावान वरुण सुख वर्षक हो
दुःखवारक हो।। हमें भी अपनी छाया में लेकर दुःख संताप व कष्ट हरो…
हे ईश्वर…
हे परमेश! संताप के वारक विपद् विदारिणी शरण में लो,
हृद-मन्दिर में आके विराजो, हे तेजस्वी देव प्रभो!
आऽऽ, हे ज्योतिर्मय अपने प्रकाश से, तमोभाव विदीर्ण करो,
डूवें गिरें या ठोकर खाएँ इन सबका निस्तार करो।
हे ईश्वर…
तुम जैसी तरुणाई कहाँ है, प्रभु तुम जैसा बाँकापन
कहाँ तुम्हारे जैसी वीरता, सदा युवा हो तुम भगवन्
मुझ स्तोता पर कर दो कृपा, हों भयमुक्त भरित जीवन
तुम्हरी तरुणता बलवत्ता का दिव्य स्वरूप हृदयंगम हो।
हे ईश्वर…
(अग्रगन्ता) आगे जाने वाला, प्रधान। (पतित) गिरा हुआ। (उन्नायक) उठाने वाला।
(निस्तार) पार लगाना। (तरुणाई) जवानी। (बाँकापन) वीरता, बहादुरी। (हृदयंगम) मन में
बैठा हुआ।










