तेरे कान चारों ओर से सुनते हैं

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उत त्वाव॑धिरं व॒यं श्रुतर्कर्ण सन्त॑मूतयें। दूरादि॒िह हवामहे

।। ऋ. ८.४५.१७

तर्जः मला तुझे मनोगत मला कभी कळेल

कही जिसे मनोव्यथा घटा नहीं दुःख बढ़ा
बिना कान के तू सुनता देता मिटा मन की व्यथा॥

जब सुनाया दुःख ये जग को, सोचा बाँट के होगा कम
ये भी अनुभव उलटा निकला दुःख से हो गई आँखें नम
बधिर होंगे सुनने वाले ना ही मिली दुःख की दवा।
॥कही जिसे ॥

पतित करती कामनायें व्यथित करती विफलतायें
हुआ विकल कल ना मिला पाया न प्रकाश तेरा
जग की ज्वालाओं से घिरकर हुआ दूर तुझसे पिता
॥ कही जिसे ॥

काम क्रोध लोभ मोह अहंकार में छला गया हूँ
कैसे प्रभु छुटकारा पाऊँ शरण तेरी चाहता हूँ
नाना राक्षस राह रोकें प्रभु मुझको बचा
॥ कही जिसे ॥

ना हूँ केवल मैं सताया और बहुत से लोग हैं
ना सुनें जो मेरी सबकी सुन प्रभु अनुरोध है।
तेरे द्वार मेरे लिये क्यों नहीं खोलता
॥ कही जिसे ॥

तू ही रक्षक बन्धु मेरा, हे प्रभु! सर्वज्ञ तू
जैसा हूँ प्रभु मैं हूँ तेरा, शरण दे अल्पज्ञ हूँ
जाएगा ना कुछ भी तेरा, जीवन सँवरेगा मेरा
॥ कही जिसे ॥

(बबिर) बहरा। (पतित) गिरावट। (कल) चैन। (विकल) बेचैन, व्यग्र। (अनुरोध) प्रार्थना