तत्वदर्शी तेरी शोभा से अमृत धारते हैं।

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तव श्रिया सुदृशो देव देवाः पुरु दधाना अमृतं सपन्त ।

होतारंमाग्निं मनुषो नि पेदुर्दशस्यन्त उशिजः शंसमायोः ॥ ऋ. ५.३.४

तर्जः भीतर अनन्त, प्रकाश

भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित (2)
याज्ञिक आत्मा हुई विभासित ॥
॥ भीतर आनन्त ॥

सत्यासत्य के जानो भेद आत्मा भिन्न है भिन्न है देह (2)
शरीर विषयों से जो विरक्ति यही वैराग्य की वृत्ति ॥
॥ भीतर ॥

शम’, दम, उपरति’, श्रद्धा’, तितिक्षा’, समाधान ये षटक सम्पत्ति (2)
श्रवण मनन निदिध्यासन दर्शन प्राप्त करायें मुक्ति॥
॥ भीतर ॥

ईश उपासना शुक्ल कर्म सब, धारण कर मिलती है मुक्ति (2)
करें भक्ति जो जगन्नायक की पायें अमृत तृप्ति ॥
॥ भीतर ॥

जब तक जीव को जग का बंधन, कर्म अनुसार है सुख दुख क्रंदन (2)
आनन्द मिले ना आसक्ति से, रहे ग्रस्त दुर्गति॥
॥ भीतर ॥

परम तत्वदर्शी ऋषि योगी, आत्मा की शोभा को वरते (2)
बोध कराते मुक्ति मार्ग का, बनते आत्म सुदर्शी॥
॥ भीतर ॥

तेज आन्तिरिक आत्माओं का महात्माओं को प्रभु है देता (2)
ब्रह्मलोक के आश्रित कर प्रभु, देते मोक्ष की सिद्धि ॥
॥ भीतर ॥

(विभासित) ज्योतिर्मान। (शम) अपनी आत्मा और अन्तकरण को धर्माचरण में प्रवृत्त
कराना। (दम) कर्मेन्द्रियों को व्याभिचार आदि कुकर्मों से बचाकर जितेन्द्रियत्वादि
शुभकर्मों से प्रवृत्त रखना। (उपरति) दुष्ट कर्मों वाले मनुष्य से सदा दूर रहना।
(श्रद्धा) वेदादि सत्यशास्त्रों और उनके बोध से पूर्ण आप्तविद्वान सत्य उपदेष्टा
महानुभावों के सत्यवचनों को मानना। (तितिक्षा) चाहे निंदा स्तुति लाभ हानि
क्यों न हो किन्तु हर्ष शोक छोड़, मुक्ति साधनों में लगे रहना। (समाधान)
चित्त की एकाग्रता। (वृत्ति) स्वभाव। (तृप्ति) संतोष। (ग्रस्त) पकड़।
(शुक्ल) निर्दोष, पवित्र। (आसक्ति) लगाव। (दुर्गति) विपत्, नरक। (तत्वदशी)
तथ्यों को जानने वाला, दार्शनिक। (बोध) ज्ञान। (सुदर्शी) सुन्दर विचारशील।
(सिद्धि) मुक्ति। (वैराग्य) स्वार्थ मूलक प्रवृत्तियों का त्याग।