टंकारा से आया वरदान ना देखा जग ने
ऋषि दयानन्द सा महान ॥ टंकारा ॥
देश की दशा पे ऋषिवर नैन भर रोए, देख गुमराहों को चैन से न सोए
समझ ना सके ऋषि को लोग थे नादान ॥ टंकारा ॥
छुआछूत ऊँच नीच के भेद मिटाने, आया दयानन्द सबको गले से लगाने
पतितों का दयानन्द ने किया उत्थान ॥ टंकारा ॥
पाखण्डियों ने अपने पंथ थे चलाए, पञ्जों में जकड़े लोग ऋषि ने छुड़ाए
मतवादियों की कर दी नींद हराम ॥ टंकारा ॥
बैठे थे लोग वेदों को भुलाए, फैले थे सदियों से रूढ़ियों के साए
वेदविहीनो को दिया सत्य का ज्ञान ॥ टंकारा ॥
जन गण मन को सही मार्ग दिखाए, दीप जो भी बुझ चुके थे ऋषि ने जलाए
अपने गुरु के पूरे किए अरमान ॥ टंकारा ॥
मृत्यु से डराया विष के प्याले पिलाए, डरके मृत्यु ने अपने प्राण बचाए
दान दया का बाँट के पाया प्रभुधाम ॥ टंकारा ॥










