भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित

भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित

भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित ओ३म् तव॑ श्रि॒या सु॒दृशो॑ देव दे॒वाःपु॒रू दधा॑ना अ॒मृतं॑ सपन्त ।होता॑रम॒ग्निं मनु॑षो॒ नि षे॑दुर्दश॒स्यन्त॑उ॒शिज॒: शंस॑मा॒योः ॥ ऋग्वेद 5/3/4 भीतर अनन्त...