स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज का जीवन परिचय
प्रारम्भिक जीवन
स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज का जन्म पंजाब प्रान्त के जिला लुधियाना के मोही ग्राम में हुआ था। आपके पिता का नाम संगत सिंह तथा माता का नाम भागों था। बचपन में ही आपकी माता का देहान्त हो गया, जिससे आपका पालन-पोषण आपके नाना के यहाँ हुआ। आपके एक छोटे भाई का नाम नौरंग सिंह था।
गृहत्याग एवं संन्यास जीवन
यौवनारंभ में ही जब आप अपने पिता के साथ सेना में भर्ती होकर फौज-जमादार बन चुके थे, तब एक दिन एक संन्यासी साधु से भेंट हुई। साधु ने आपसे पूछा—”क्या तुम मुझसे ब्रह्मज्ञान की शिक्षा लेना चाहोगे?” आपने सहर्ष सहमति जताई। आपने पिता से फौज छोड़ने की अनुमति मांगी, परंतु उन्होंने साफ इनकार कर दिया और विवाह का दबाव भी डाला। किंतु आपने जीवन का उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार एवं लोकसेवा निर्धारित किया था, इसलिए दृढ़ निश्चय कर गृहत्याग कर दिया और उस साधु स्वामी विशनदास जी के शिष्यत्व में दीक्षित हो गए।
विद्या-अध्ययन एवं विदेश यात्रा
संन्यास ग्रहण करने के बाद आप स्वामी विशनदास जी के साथ चीन, हांगकांग, फार्मोसा, तिब्बत आदि देशों में गए और गहन स्वाध्याय करते रहे। आपने योग, वेद, दर्शन, धर्मशास्त्र और भारतीय संस्कृति का गहन अध्ययन किया। आपके ज्ञान, त्याग और निर्भीकता से प्रभावित होकर एक प्रसिद्ध साधु ने आपको “स्वतन्त्रानन्द” नाम प्रदान किया। इस नाम के पीछे आपकी स्वतंत्र विचारधारा और निर्भीक व्यक्तित्व था।
आर्य समाज से जुड़ाव
विद्या अध्ययन के बाद जब आप भारत लौटे, तो एक दिन पंजाब के एक गाँव में आपकी भेंट एक आर्य समाजी कार्यकर्ता से हुई, जिन्होंने आपको सत्यार्थ प्रकाश ग्रंथ भेंट किया। आपने पूरी रात जागकर वह ग्रंथ पढ़ा और अत्यंत प्रभावित हुए। अगले दिन आपने उसी आर्य समाजी से आग्रह किया कि वे आपको मंच से बोलने का अवसर दें। आपने जो भाषण दिया, उससे श्रोतागण अत्यंत प्रभावित हुए। यहीं से आर्य समाज के प्रचार में आपका प्रवेश हुआ।
तपस्या और योग-साधना
स्वामी जी का जीवन अत्यंत तपस्वी था। आपने कौपीन व्रत (केवल एक वस्त्र धारण करना) का पालन किया और जीवनभर किसी से कोई वस्त्र या सुविधा नहीं मांगी। आप योगाभ्यास में निपुण थे। आपने कठोर तप और संयम से आत्मशक्ति अर्जित की। लोग आपको प्रेमपूर्वक “बाल्टी वाले बाबा” कहते थे, क्योंकि आप अपने पास केवल एक बाल्टी रखते थे जिससे स्नान, भोजन और जल का संग्रह करते थे।
पिता से भेंट एवं संतोष
एक बार जब आप नासिक कुम्भ में अपने गुरुभाइयों के साथ गए हुए थे, तब वहाँ आपकी मुलाकात एक वृद्ध व्यक्ति से हुई, जो कुछ देर बाद आपके ही पिता निकले। उन्होंने जब आपको पहचाना, तो प्रसन्नता से भर उठे और बोले—”बेटा, अब मुझे गर्व है कि तूने सच में जीवन को सार्थक कर लिया है।”
संगठन निर्माण और शुद्धि आन्दोलन
आपने कई धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाएँ स्थापित कीं। हरिद्वार के निकट आपने एक आर्य उपदेशक महाविद्यालय की स्थापना की, जहाँ यज्ञ, वेद, संस्कार, योग और व्याकरण की शिक्षा दी जाती थी। आपने अफ्रीका और मॉरीशस में भी आर्य समाज के प्रचार हेतु यात्राएँ कीं। आपने शुद्धि आन्दोलन, नारी शिक्षा, ग्रामीण उत्थान, और वैदिक संस्कृति के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
गोरक्षा आन्दोलन एवं सेवा कार्य
आपने गायों की रक्षा हेतु भी कठोर प्रयास किए। आपने विभिन्न स्थानों पर गौशालाएँ और गौसंरक्षण समितियाँ स्थापित कीं। आप कहते थे, “गौसेवा में ही देवसेवा है।” आपने ग्रामीण समाज में सनातन भारतीय जीवनमूल्यों की स्थापना हेतु निरंतर कार्य किया।
अंतिम काल
स्वामी जी ने जीवन के अंतिम वर्षों में भी प्रचार कार्य बंद नहीं किया। कैंसर जैसी असाध्य व्याधि होने पर भी आपने हिम्मत नहीं हारी। कुछ समय दिल्ली में उपचार के बाद आप बंबई गए। वहीं पर आपने अपने जीवन की अंतिम साँसें लीं।
उपसंहार
स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज का सम्पूर्ण जीवन त्याग, तपस्या, सेवा, संयम और प्रचार का उदाहरण है। उन्होंने न केवल आर्य समाज को जीवंत ऊर्जा दी, अपितु योग, वेद, और भारतीय संस्कृति को वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठित किया। उनका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। वे सच्चे अर्थों में स्वतन्त्र विचारधारा के ध्वजवाहक थे।










