अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानन्द जी का 99वाँ बलिदान दिवस
आबूपर्वत के समस्त आत्मीय धर्मप्रेमी सज्जनों, माताओं, बहिनों एवं युवा मित्रों !
सादर सप्रेम नमस्ते।
आधुनिक युग में गुरुकुल परम्परा के उन्नायक, शुद्धि आन्दोलन के प्रणेता, महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनन्य शिष्य अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज का 99 वाँ बलिदान दिवस श्रद्धा, भक्ति एवं उल्लास के साथ आगामी 23 दिसम्बर 2025 को आर्य समाज मन्दिर, नक्की झील, आबूपर्वत में पूज्य संवित् स्वामी सच्चिदानंद गिरि जी महाराज महंत, संत सरोवर, आबूपर्वत एवं पूज्य स्वामी नरसिंहदास जी महाराज महंत, ज्ञानेश्वर हनुमान मन्दिर आबूपर्वत के पावन सानिध्य में आयोजित किया जा रहा है।
देश, धर्म व संस्कृति के रक्षक स्वामी श्रद्धानन्द जी के पावन बलिदान दिवस के उपलक्ष्य में विशाल वैदिक महायज्ञ, ओजस्वी भजन एवं विद्वानों के सारगर्भित प्रवचनों के साथ-साथ आबूपर्वत निवासी दलित, वनवासी 100 विधवा महिलाओं को श्रीमती प्रेरणा जी धर्मपत्नी श्री दिनेश जी भार्गव एवं श्रीमती खुशबू जी धर्मपत्नी श्री वीरेंद्र जी भार्गव निवासी रामगढ, जैसलमेर की ओर से अन्नदान (दाल, चावल, गुड, चीनी, तेल, प्रत्येक को पाँच किलो) किया जायेगा।
अतः आबूपर्वत निवासी सभी सनातन धर्मी बन्धुओं से सविनय अनुरोध है कि इस बलिदान दिवस पर अपने इष्ट-मित्रों एवं परिवार सहित पधारकर धर्मलाभ प्राप्त करें तथा अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानन्द को अपनी भावांजलि अर्पित करें।
(कार्यक्रम विवरण)
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डॉ. अंशु प्रिया जी (IAS) SDM महोदया, आबू पर्वत
- दिनांक : 23 दिसम्बर 2025 (मंगलवार) कार्यक्रम स्थल- आर्य समाज मंदिर, नक्की झील
- चतुर्वेद शतकम् महायज्ञ (हवन) समयः प्रातः 1 बजे से 3 बजे तक,
- भजन-उपदेश – पण्डित केशवदेव जी 3 बजे से सायं 5 बजे तक,
- व्याख्यान – स्वामी ओमानन्द सरस्वती अध्यक्ष- गुरुकुल आबू पर्वत
- मंच संचालक श्री गिरीश जी जोशी, उदयपुर
- कार्यक्रम के अंत में अन्नदान एवं प्रसादी वितरण
निवेदक
आर्य समाज मन्दिर, आबूपर्वत के समस्त सदस्यगण
📞 सम्पर्क सूत्र:
9414589510, 8005940943
अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानन्द जी
भारतीय नवजागरण के स्वर्णिम अध्याय में जिन महापुरुषों ने अपने तप, त्याग और बलिदान से राष्ट्रचेतना को सुदृढ़ किया, उनमें अमरहुतात्मा स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती का नाम अत्यन्त श्रद्धा और गौरव के साथ स्मरण किया जाता है। वे केवल एक संन्यासी ही नहीं, अपितु वैदिक पुनर्जागरण के कर्मयोगी, निर्भीक समाज-सुधारक तथा भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सशक्त और निडर प्रहरी थे।
स्वामी श्रद्धानन्द का जीवन इस सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि विचार तभी सार्थक होते हैं, जब वे आचरण में उतरते हैं। ऋषि दयानन्द सरस्वती के पश्चात् जिन महापुरुषों ने उनके वैदिक विचारों को व्यवहार में ढालकर देश और समाज की सर्वाधिक सेवा की, उनमें स्वामी श्रद्धानन्द अग्रगण्य हैं।
बाल्यकाल से वैराग्य तक
स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म 22 फरवरी 1856 को पंजाब प्रान्त के जालन्धर जनपद स्थित तलवान ग्राम में हुआ। उनका पूर्व नाम मुंशीराम था। पिता लाला नानकचन्द्र पुलिस विभाग में अधिकारी थे। बाल्यकाल से ही मुंशीराम में तीव्र बौद्धिक क्षमता और सत्य की खोज की प्रवृत्ति विद्यमान थी।
उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त कर पंजाब विश्वविद्यालय से विधि (कानून) की शिक्षा पूर्ण की और एक सफल वकील बने। किन्तु सांसारिक वैभव और प्रतिष्ठा उन्हें संतुष्ट न कर सकी। उनके मन में समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना निरन्तर प्रबल होती गई।

महर्षि दयानन्द का प्रभाव
युवावस्था में ईश्वर के अस्तित्व को लेकर उनके मन में संशय उत्पन्न हुआ, परन्तु महर्षि दयानन्द सरस्वती के तर्कयुक्त वैदिक विचारों ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। वे वैदिक धर्म के सशक्त समर्थक बन गए और संन्यास ग्रहण कर स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से समाज-सेवा में प्रवृत्त हुए।
शिक्षा और समाज-सुधार का महायज्ञ
स्वामी श्रद्धानन्द का दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा ही राष्ट्रनिर्माण का मूलाधार है। इसी उद्देश्य से उन्होंने १९०२ में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय (हरिद्वार) की स्थापना की, जहाँ वैदिक संस्कृति और आधुनिक ज्ञान का समन्वय किया गया। इसके अतिरिक्त उन्होंने अनेक गुरुकुलों की स्थापना कर भारतीय शिक्षा-परम्परा को नवजीवन प्रदान किया। वे अस्पृश्यता और जातिवाद के कट्टर विरोधी थे।
अछूतोद्धार के क्षेत्र में उनके प्रयास क्रान्तिकारी थे। अपनी पुत्री अमृतकला, पुत्र हरिश्चन्द्र और इन्द्र का अन्तर्जातीय विवाह कर सामाजिक समता और मानव-मात्र की गरिमा को वैदिक दृष्टि से स्थापित किया।
राष्ट्रीय चेतना
स्वामी श्रद्धानन्द ने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभायी। उन्हें 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद अमृतसर में आयोजित कांग्रेस के वार्षिक सत्र की स्वागत समिति के अध्यक्ष (Chairman of the Reception Committee) के रूप में चुना गया था। रॉलेट एक्ट और मार्शल लॉ के विरुद्ध उनका निर्भीक प्रतिरोध अंग्रेजी सत्ता के लिए चुनौती बन गया। वे कर्म और विचार-दोनों से स्वतन्त्रता के उपासक थे।
शुद्धि आन्दोलन
स्वामी श्रद्धानन्द का शुद्धि आन्दोलन भारतीय सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। 1924 में स्वामी जी ने शुद्धि सभा की स्थापना और शुद्धि आन्दोलन चलाया। इस आन्दोलन के माध्यम से उन्होंने बलात् धर्मान्तरित हिन्दुओं की घर-वापसी करवाई और लगभग दो लाख लोगों को पुनः सनातन धर्म से जोड़ा। इससे हिन्दू समाज में आत्मगौरव, संगठन और एकता का संचार हुआ।
अमर बलिदान
मजहबी कट्टरता से प्रेरित होकर 23 दिसम्बर 1926 को दिल्ली में अब्दुल रशीद नामक एक कट्टरपन्थी द्वारा स्वामी श्रद्धानन्द की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि वैदिक (हिन्दू) चेतना को दबाने का प्रयास था। किन्तु उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया, वे मृत्यु के पश्चात् भी अमर हो गए।
विरासत और प्रेरणा
भारत सरकार ने 1970 में उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी कर उनकी स्मृति को राष्ट्रीय मान्यता प्रदान की। आज भी स्वामी श्रद्धानन्द का जीवन त्याग, तपस्या, निर्भीकता और राष्ट्रभक्ति का उज्ज्वल आदर्श है।
स्वामी श्रद्धानन्द केवल इतिहास की विभूति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि यदि संकल्प दृढ़ और उद्देश्य पवित्र हो तो धर्म, शिक्षा और राष्ट्र-तीनों की सेवा एक साथ सम्भव है।
सम्पर्क सूत्र
आर्ष गुरुकुल महाविद्यालय, आबूपर्वत
जिला – सिरोही, राजस्थान
📞 9414589510 | 8005940943
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