स्वामी ओमानन्द सरस्वती

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आप नरेला (दिल्ली) के समृद्ध किसान चौ० कनकसिंह के घर सन् १९११ में उत्पन्न हुए। आपका बचपन का नाम भगवान्सिंह था। यौवन में आचार्य भगवान्देव के नाम से विख्यात हुए और अब हैं स्वामी ओमानन्द सरस्वती।

सन् १९३१ में कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर स्वतन्त्रता आन्दोलन में जुट गये। अपनी जन्मभूमि नरेला में ही आर्य विद्यार्थी आश्रम, धर्मार्थ औषधालय, पुस्तकालय तथा गोशाला का संचालन किया। दिन में स्वराज्य प्राप्ति आन्दोलन तथा रात में रात्रि पाठशालाओं का आयोजन करते थे।

महात्मा गांधी जी के सम्पर्क से अनुतोद्धार में सक्रिय भाग लिया। विशाल पारिवारिक सम्पत्ति का मोह त्यागकर अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत धारण कर देश सेवा में जुट गये।

१९४२ के असहयोग आन्दोलन में विशेष सक्रिय होने के कारण अंग्रेज सरकार का गुप्तचर विभाग अहर्निश आपका पीछा छाया की भांति करता था।


गुरुकुल झज्जर में सेवा और समाज कार्य

अक्तूबर १९४२ में दीपावली पर गुरुकुल झज्जर के आचार्य पद का कार्यभार सम्भालकर, गुरुकुल को केन्द्र बनाकर देश कार्य में लगे रहे।

१९४७ में हिन्दू-मुस्लिम फसाद में बेघर हुए मेवात के सहस्रों लोगों की सहायतार्थ दो सहस्र मन अन्न एकत्रित करके भिजवाया।

गुरुकुल झज्जर में गोशाला, पुस्तकालय, धर्मार्थ औषधालय, प्रकाशन विभाग, सुधारक हिन्दी मासिक पत्र तथा लगभग ३२ छोटी-बड़ी पुस्तकें लिखकर हजारों की संख्या में छपवाकर प्रचार करते रहते हैं।

स्कूल-कॉलेज तथा ग्रामों में ब्रह्मचर्य शिक्षण शिविर तथा भाषणों द्वारा विशेष सुधार कार्य करते रहे हैं। निरन्तर घोर परिश्रम करके अद्वितीय पुरातत्त्व संग्रहालय का निर्माण किया है।

सिद्ध वैद्य होने के कारण घूमते-फिरते हजारों रोगियों की चिकित्सा भी करते रहते हैं।


सम्मान और मान्यता

२१ मार्च १९६८ को हरियाणा सरकार के भाषा विभाग ने आपको सम्मानित किया। इसके पश्चात् भारत के राष्ट्रपति ने राष्ट्रपण्डित के रूप में सम्मानित किया और आजीवन ₹1000 वार्षिक दक्षिणा भी प्रदान की।

आप केन्द्रीय संस्कृत मण्डल तथा पुरातत्त्व संग्रहालय सलाहकार समिति के भी सदस्य हैं।

रूस, जापान, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, बाली, इंडोनेशिया, जर्मनी, अफ्रीका आदि विदेशों में इतिहास एवं वैदिक धर्म का सन्देश दे चुके हैं।


आर्यसमाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण

आप अपना तन, मन, धन सब कुछ आर्यसमाज एवं राष्ट्र सेवा में अर्पित करके निरन्तर साधना में लीन हैं।

आपके ही शब्दों में —


श्री राजेन्द्र जिज्ञासु के संस्मरण

“मैं कॉलेज का छात्र था, स्वाध्याय अनुरागी था। आर्य प्रकाशकों की प्रकाशन सूचियाँ व आर्य पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने के लिए उत्सुकता रहती थी। पत्रों में गुरुकुल झज्जर के आचार्य भगवान्देव जी का नाम कई बार पढ़ने को मिला।

आचार्य जी द्वारा लिखा कुछ साहित्य मंगवाया, पढ़ा और प्रभावित हुआ। मैंने अनुभव किया कि लेखक के शब्द उसके हृदय का प्रतिविम्ब हैं।

१९५४ ई० में दयानन्द मठ दीनानगर गया। वहाँ हरियाणा के कई विद्यार्थी थे। तब रेवाड़ी क्षेत्र के श्री सत्यव्रत वसु (अब श्री सुधानन्द) ने हरियाणा के आर्यसमाज के सम्बन्ध में चर्चा करते हुए बताया कि —

तभी पता चला कि आचार्यप्रवर सिला हुआ वस्त्र भी नहीं पहनते, नमक, मिर्च, मोठा आदि पदार्थों का सेवन नहीं करते।


प्रथम भेंट और प्रेरणा

यह वृत्तान्त सुनकर आर्य जाति के इस अद्वितीय तपस्वी के प्रति मेरे हृदय में एक स्थान बन गया।

१९५६ ई० में प्रथम बार जालन्धर के एक हिन्दी सम्मेलन में आचार्य जी के दर्शन किए। कुछ वार्ता भी हुई। तब से मैं उनका हो गया और वह मेरे हो गए।

आर्यसमाज के संगठन सम्बन्धी दृष्टिकोण में कभी-कभी उनसे विचारभेद भी हुआ, परन्तु इस देवपुरुष की सतत साधना, विद्वत्ता, प्रभुभक्ति, वेदनिष्ठा व ऋषि दयानन्द के प्रति अडिग श्रद्धा के कारण मेरा सिर सदा इनके सामने झुक जाता है।


स्वामी जी की परिश्रमशीलता और साधना

१९५८ ई० में नरवाना मेरा कार्यक्षेत्र बना। तब ग्रीष्म अवकाश में आचार्य जी के साथ प्रचार व संगठन के काम में कुछ दिन लगना पड़ा।

प्रातःकाल से रात्री नौ-दस बजे तक यह महापुरुष कार्यरत रहते थे। एक ही दिन में पाँच-छः ग्रामों में घूम जाना साधारण बात न थी। युवक थक जाते थे, पर आचार्य जी ने कभी शिकायत का नाम न लिया।


त्याग और सेवा का उदाहरण

एक बार अबोहर दयानन्द कॉलेज के प्राचार्य श्री नारायणदास ग्रोवर की विनती पर मैंने स्वामी ओमानन्द जी से कॉलेज आने की प्रार्थना की।

अत्यन्त व्यस्त होते हुए भी, आप श्री आचार्य वेदव्रत शास्त्री के स्कूटर के पीछे बैठकर सारी रात वर्षा में भीगते हुए प्रातः अबोहर पहुँचे और सभा में चुपचाप पीछे बैठ गये।

उनके जीवन में ऐसी अनेक घटनाएँ हुई हैं।


आर्यसमाज में एकता के प्रयास

पानीपत में आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का चुनाव दूसरी बार होने वाला था। मैंने दीनानगर से स्वामी जी को पत्र लिखा कि जैसे भी हो आर्यसमाज में एकता लायें।

सर्वसम्मत चुनाव हो जावे, अन्यथा विरोधी पन्थ आर्यसमाज का नाश करेंगे। इस पत्र का स्वामी जी ने आदरपूर्वक उत्तर दिया और सहयोग हेतु तत्पर हुए।


उदारता और विनम्रता का प्रतीक

आर्यसमाज हनुमान रोड में एक बैठक में कुछ नेताओं ने हरियाणा सभा द्वारा प्रकाशित इतिहास पर आपत्ति की।

स्वामी जी ने अत्यन्त संयम और विनम्रता से सबको समझाया और मतभेद को सुलझाया। उनका व्यवहार सदा शान्त और सहनशील रहता था।


आर्य महापुरुषों के प्रति श्रद्धा

स्वामी श्रद्धानन्द, पं० लेखराम, स्वामी स्वतन्त्रानन्द, स्वामी सर्वदानन्द आदि के जीवन की घटनाएँ सुनाते हुए स्वामी ओमानन्द जी भावविभोर हो जाते थे।

उनकी वाणी में ऐसा तेज और श्रद्धा होती थी कि सुनने वाले अभिभूत हो जाते थे।


ज्ञान और अध्ययन में अनुरक्ति

एक व्यक्ति ने बताया कि १९६७ के गोरक्षा आन्दोलन के दौरान कारागार में भी स्वामी जी निरन्तर एक ही विषय पर कई सप्ताह तक बोलते रहे।

उनका ज्ञान असीम था — धर्म, इतिहास, आयुर्वेद, वेद, संस्कृति — सबका गहरा अभ्यास।


वैराग्य और धन से उदासीनता

स्वामी केशवानन्द जी ने करोड़ों की सम्पत्ति व विशाल संस्थाएँ आपको भेंट करनी चाही, पर इस वीतराग ने संगरिया जाना स्वीकार नहीं किया।

उनका कहना था — “मेरा स्थान वहीं है जहाँ सेवा और संघर्ष है।”


कृषकों के प्रति स्नेह

एक बार स्वामी जी हरियाणा के ग्रामों में प्रचार कर रहे थे। खेतों में काम करते किसानों के पास रुककर वे उनसे आत्मीयता से संवाद करते।

कृषक जीवन के प्रति उनका स्नेह देखकर ग्रामीण भावविभोर हो जाते थे।


निर्धनों के प्रति प्रेम

पूज्य स्वामी सर्वानन्द जी के साथ रहते हुए स्वामी ओमानन्द जी निर्धनों की सहायता हेतु जो भी सम्भव होता, स्वयं करते।

उन्होंने कहा था —


धर्म प्रचार की तड़प

जहाँ भी चार-छः युवक मिल जाते, स्वामी जी वहीं रुककर उन्हें वेद, आर्य समाज और राष्ट्र सेवा का संदेश देते।

उनकी वाणी में जादू था — जो सुनता, वह प्रभावित हुए बिना न रहता।


राष्ट्रभक्ति और संवेदनशीलता

दीनानगर में स्वामी सर्वानन्द जी ने बताया कि स्वामी ओमानन्द जी युद्धकाल में भी डरे नहीं।

गोलों की गर्जना में, तोपों के वर्षण में, वे धर्म रक्षा के लिए अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे।


निष्कर्ष

मेरे मत में —