जन्म और बाल्यकाल
स्वामी धर्मानन्द जी का जन्म एक सामान्य किसान परिवार में पलवल (हरियाणा) के निकट नये गांव में हुआ। बचपन से ही आपको मल्लयुद्ध (कुश्ती) का बड़ा शौक था और आप अपने समय के अच्छे पहलवान माने जाते थे। आपके गांव व्रज में गाने-बजाने की परम्परा थी, इसी कारण आपको भी बाल्यकाल से ही संगीत व भजन-कीर्तन का विशेष रुचि हो गई।
आर्य समाज से जुड़ाव
आर्य समाज के प्रचार से प्रभावित होकर आप धीरे-धीरे आर्य समाज के भजनोपदेशक बन गए। खेती और पहलवानी करते हुए भी आप आर्य समाज का प्रचार करते रहे।
पारिवारिक जीवन
युवावस्था में ही आपकी धर्मपत्नी का देहांत हो गया। उस समय आपके तीन बच्चे थे। मित्रों ने दूसरे विवाह का परामर्श दिया, परंतु बड़े पुत्र के विरोध और उसकी भावनाओं को देखकर आपने आजीवन अविवाहित रहने का निश्चय कर लिया।
संन्यास और गुरुकुल सेवा
आपने अपनी सम्पत्ति स्वामी स्वरूपानन्द जी के परामर्श से बेच दी और गुरुकुल काँगड़ी में धन दान कर अपने पुत्र जयदेव को वहां प्रविष्ट कराया। तीनों पुत्रों को आपने गुरुकुलों में भेजा और स्वयं संन्यास ग्रहण कर लिया।
जयदेव जी – गुरुकुल स्नातक बने, बाद में स्वामी दयानन्द का सुंदर चित्र छपवाकर देशभर में प्रसारित किया। किंतु युवावस्था में ही उनका देहांत हो गया।
हरिदत्त शास्त्री – गुरुकुल डौरली से शिक्षा प्राप्त कर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आयुर्वेद पढ़ रहे थे। वहीं रोगग्रस्त होकर उनका निधन हो गया।
तृतीय पुत्र – बाल्यकाल में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ।
आपको तीनों पुत्रों की मृत्यु का वज्राघात सहना पड़ा, परंतु आपने धैर्य रखते हुए जीवन को पूर्ण रूप से समाज सेवा और आर्य समाज प्रचार में समर्पित कर दिया।
सामाजिक व राष्ट्रीय योगदान
स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक बार जेल यात्राएँ कीं। हैदराबाद सत्याग्रह और गोरक्षा आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। निर्धन विद्यार्थियों की आर्थिक सहायता कर उनकी शिक्षा की व्यवस्था की। वृद्धावस्था में स्वतंत्रता सेनानी पेंशन प्राप्त हुई, जिसे आपने अनेक बार वेदों से यज्ञ करवाने में व्यय किया।










