‘सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पंथा विततो देवयान‘
अर्थात सत्य की विजय एवं असत्य की हमेशा पराजय होती है।
स्वामी दयानंद सरस्वती के 200वीं जयंति
एवं स्व० वासुदेव साह (पूर्व VLW) के द्विवर्षीय पुण्य तिथि (11-12 अप्रैल 2024) के अवसरपर आयोजित वैदिक कार्यक्रम
हे मानव ! तू समझाता क्यों नहीं है, श्रेष्ठ कर्मों की परिणति सद्गति है अप्यथा दुर्गति है।
संसार में असंख्य योनियों में आवागमन करता हुआ जीवात्मा जब मुनष्य जीवन को प्राप्त होता है तो यह मनुष्य जीवन की प्राप्ति उसके लिए एक स्वर्णिम विलक्षण होता है। जब वह अपनी पारलौकिक उन्नति कर सकता है। सामान्य से सामान्य मनुष्य जाति में उत्पन्न व्यक्ति परमात्मा प्रदत्त मनन शीलता का उपयोग करते हुए थोड़ा गहन चिंतन-मनन करे तो भी वह अपने मानव जीवन के गूढ़ रहस्य को जान-समझ सकता है और इसे सफल बना सद्गति को प्राप्त की सकता है। अन्यथा पारलौकिक उन्नति तो दूर, इस मानव जीवन को भी धूल-धूसरित कर दुर्गति को प्राप्त हो सकता है।
इसके लिए कोई आवश्यक नहीं कि वह बड़-बड़ी पोथियों को पढ़े और अगर उसने खूब शास्त्रों का अध्ययन कर अपना शाब्दिक ज्ञान सागर तो विस्तृत कर लिया किन्तु चिन्तन-मनन के द्वारा जो तात्विक ज्ञान प्राप्त करना था वह नहीं कर पाया। शाब्दिक ज्ञान का विशाल सागर भी उसे दुर्गति से नहीं बचा सकता।
प्रत्येक मनुष्य को सर्वप्रथम तो यह विचार अत्यन्त गहनता के साथ करना चाहिए कि क्या उसे मानव जीवन अपनी स्वेच्छा से प्राप्त हुआ है। या वह जब चाहे उसे मानव जीवन प्राप्त हो सकता है? जब इय प्रश्न पर वह गहनता के साथ चिन्तन-मनन करेगा तो निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि नहीं, यह मानव जीवन मुझे अपनी स्वेच्छा से प्राप्त नहीं हुआ है। कोई ऐसा है जिसने मुझे यह मानव जीवन प्रदान किया है। जब गहराई में जाकर जानने का प्रयास करेगा कि क्या जिसने मुझे यह जीवन प्रदान किया है उसकी स्वेच्छा से यह मानव जीवन प्राप्त हुआ है? तो जान पाएगा कि न तो अपनी स्वेच्छा से सयह मानव जीवन प्राप्त हुआ है और न ही उसकी स्वेच्छा से यह मानव जीवन प्राप्त हुआ है।
जिसने यह मानव जीवन प्रदान किया है यह मानव जीवन तो मात्र और मात्र उसकी व्यवस्था के अन्तर्गत प्राप्त हुआ है और उस व्यवस्था का नाम है. -‘कर्मफल‘।
और मानव जीवन ही क्यों? मानव जीवन में प्राप्त होने वाले सुख-दुःख और समस्त ऐश्वर्य उस कर्मफल व्यवस्था से ही प्राप्त हुआ है। दूसरा विचारणीय प्रश्न है कि क्या इस मानव जीवन की पूर्णता के पश्चात् पुनः मानव जीवन, और उसके बाद पुनः मानव जीवन और पुनः उसके बाद मानव जीवन अर्थात् पुनः पुनः मानव जीवन की प्राप्ति होगी? परमपिता परमात्मा द्वारा प्रदत्त बुद्धि तत्व का सदुपयोग कर गहनता के साथ यह जानने का प्रयास करें तो ऐसी कोई बाधा नहीं है कि उसने शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है तो वह नहीं जान पाएगा।
प्रत्येक मनुष्य को परमात्मा ने इतना सामर्थ्यवान् बनाया है कि वह यह जान-समझ सकता है कि यह मनुष्य जीवन बार-बार प्राप्त होने वाला नहीं है। सुकमों का कोई संयोग ऐसा बन जाए कि पुनः मानव जीवन मिल भी जाए किन्तु बार-बार मानव जीवन ही प्राप्त हो यह कदापि सम्भव नहीं। और चिन्तन-मनन का यह सामर्थ्य परमपिता परमेश्वर ने मात्र और मात्र मानव को ही प्रदान किया है।
निकल पड़े हैं ले नाम प्रभु का ओश्म ध्वाज़ा हाथों में थामे देव दयानन्द के अनन्य भक्त, पहुँचा रहे जन-जन तक वैदिक धर्म और उच्च्चधिकारियों व गणमान्य महानुभावों को कर रहे भेंट वैचारिक क्रान्ति का स्त्रोत अमरग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाशवेद ज्ञान प्रकाश का उजियारा चहुँओर हो जिससे जन-जन सुख-शान्ति पा समृद्ध हो इस हेतु कर रहे स्थान-स्थान पर आर्य समाज स्थापना। नहीं है चिन्ता अपनी आयु-अवस्था, स्वास्थ्य की ओर अपने भोजन-विश्राम की, ना ही चिन्ता है साधन-सुविधाओं की, यह भी विचार परमेश्वर की वाणी वेदज्ञान का लाभ जन-जन तक पहुँचे।
आइये महर्षि दयानन्द के संदेश ‘बेदों की ओर लौटो’ को समर्पित इस विलक्षण यात्रा को तन-मन-धन से सहयोग कर पुण्य के भागी बनें।
यज्ञ प्रातः 8 बजे (11 एवं 12 अप्रैल 2024)
प्रवचन। 6 बजे संध्या (11 अप्रैल)
स्थानः पहलाम पंचायत भवन घौड़दौड़, सहरसा
मुख्य प्रवक्ता प्राचार्य राजीव आर्य (वैदिक दिक गुरुकुलम् सुपौल
मुख्य विन्दु वेद प्रचार एवं गुरूकुलीय शिक्षा पद्दति











