स्वामी दयानन्द सरस्वती और प्रो० मैक्समूलर

0
54

● स्वामी दयानन्द सरस्वती और प्रो० मैक्समूलर ●- भावेश मेरजा

(1) स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन चरित्र में मैक्समूलर के सम्बन्ध में उल्लेख पाया जाता है । जैसे कि – मैक्समूलर के वैदिक ज्ञान की चर्चा चलने पर स्वामी जी ने बताया कि -“यह जर्मन् विद्वान् (मैक्समूलर) इस (वैदिक ज्ञान के) क्षेत्र में तो अभी बालक ही है । जब तक वेदों का कोई पारगामी विद्वान् उसका गुरु बन कर बोध नहीं करायेगा, तब तक वेदार्थ में वह सायण, महीधर आदि मध्य कालीन याज्ञिक भाष्यकारों का ही अन्धानुकरण करता रहेगा ।”(सन्दर्भ ग्रन्थ : ‘नवजागरण का पुरोधा दयानन्द सरस्वती’, लेखक : डॉ० भवानीलाल भारतीय, प्रथम संस्करण, पृष्ठ 319)

(2) सत्यार्थ प्रकाश के 11वें समुल्लास में भी स्वामी जी ने मैक्समूलर के वेदार्थ सम्बन्धी ज्ञान के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा है -“जो लोग कहते हैं कि – जर्मनी देश में संस्कृत विद्या का बहुत प्रचार है और जितना संस्कृत मोक्षमूलर साहब पढ़े हैं उतना कोई नहीं पढ़ा । यह बात कहनेमात्र है क्योंकि ‘यस्मिन्देशे द्रुमो नास्ति तत्रैरण्डोऽपि द्रुमायते’ अर्थात् जिस देश में कोई वृक्ष नहीं होता उस देश में एरण्ड ही को बड़ा वृक्ष मान लेते हैं । वैसे ही यूरोप देश में संस्कृत विद्या का प्रचार न होने से जर्मन लोगों और मोक्षमूलर साहब ने थोड़ा-सा पढ़ा वही उस देश के लिये अधिक है। परन्तु आर्यावर्त्त देश की ओर देखें तो उनकी बहुत न्यून गणना है । क्योंकि मैंने जर्मनी देशनिवासी के एक प्रिन्सिपल के पत्र से जाना कि जर्मनी देश में संस्कृत चिट्ठी का अर्थ करनेवाले भी बहुत कम हैं । और मोक्षमूलर साहब के संस्कृत साहित्य और थोड़ी-सी वेद की व्याख्या देखकर मुझको विदित होता है कि मोक्षमूलर साहब ने इधर उधर आर्यावर्त्तीय लोगों की की हुई टीका देखकर कुछ-कुछ यथा तथा लिखा है । जैसा कि – ‘युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः । रोचन्ते रोचना दिवि ॥’ इस मन्त्र का अर्थ घोड़ा किया है । इस से तो जो सायणाचार्य ने सूर्य अर्थ किया है सो अच्छा है । परन्तु इसका ठीक अर्थ परमात्मा है सो मेरी बनाई ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ में देख लीजिये । उसमें इस मन्त्र का अर्थ यथार्थ किया है । इतने से जान लीजिये कि जर्मनी देश और मोक्षमूलर साहब में संस्कृत विद्या का कितना पाण्डित्य है ।”

(3) मैक्समूलर स्वामी जी के वेद-भाष्य (जो प्रथम मासिक रूप में प्रकाशित होता था) के ग्राहक थे । स्वामी जी ने भी मैक्समूलर के ग्रन्थ देखे थे । स्वामी जी स्वयं अन्ग्रेजी नहीं जानते थे, फिर भी यह जानने का प्रयास करते थे कि मैक्समूलर आदि पाश्चात्य विद्वान् वेद तथा वेदार्थ के सन्बन्ध में कैसी धारणा रखते हैं । वे दोनों कभी नहीं मिले, परन्तु लगता है कि दोनों एक-दूसरे के बारे में जानने की चाह अवश्य रखते थे । स्वामी दयानन्द अपने ग्रन्थों में मैक्समूलर का नाम भारतीय ढंग से ‘भट्ट मोक्षमूलर’ लिखते थे ! स्वामी जी ने अपने ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ तथा वेदभाष्य आदि ग्रन्थों में मैक्समूलर द्वारा किए गए वेदार्थ की कई स्थानों पर आलोचना करते हुए उनके द्वारा की गई वेद-व्याख्या को अप्रामाणिक दर्शाया है ।

(4) पण्डित लेखराम जी आर्य मुसाफ़िर संगृहीत स्वामी जी के जीवन चरित्र में लिखा है –“बम्बई में ही मैक्समूलर साहब की इस विषय की चिट्ठी जर्मनी से आई थी कि यदि आप यहां आवे तो बहुत बड़ी कृपा होगी और वहां के धन्य भाग्य है जहां आपने जन्म लिया है, आदि आदि । स्वामी जी ने उत्तर में लिखा था कि मेरी इच्छा आने की अवश्य थी, परन्तु यहां के लोग अभी मुझे नास्तिक कहते हैं । जब तक मैं इस देश को अच्छी प्रकार न बतला दूं कि मैं कैसा नास्तिक हूं, तब तक नहीं आ सकता । जब मैक्समूलर साहब की चिट्ठी आई थी तब वहां के भाटियों ने अपने जहाज पर ले जाने का वचन भी दिया था, परन्तु स्वामी जी स्वयं न गये ।” (पृष्ठ 272, संस्करण 2046 वि० सम्वत्)

(5) मैक्समूलर ने ‘इण्डिया वॉट केन इट टिच अस?’ तथा ‘बायोग्राफिकल ऐसेज़’ आदि ग्रन्थों में स्वामी जी, उनकी ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ तथा उनके वेद वेषयक मन्तव्यों के सम्बन्ध में टिप्पणी की है । कई आर्य विद्वानों का मत है कि स्वामी दयानन्द के ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ ग्रन्थ पढ़ने के बाद मैक्समूलर के वेद विषयक मन्तव्यों में पर्याप्य सुधार व परिवर्तन आया था ।●●●#dayanand200