स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज

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जन्म एवं परिवार

स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज का जन्म माघ शुक्ला पंचमी संवत् 1925 वि. में श्रीवास्तव कायस्थ कुल में ग्राम डुमरा जिला धारा (बिहार) में हुआ।
महाराज जी का जन्म नाम बादल था। आपकी माता का नाम देवमूर्ति तथा पिता का नाम रामगुलाम सिंह था।
आपके परिवार में दो भाई और चार बहनें थीं।
आपके दादा सूरजमल, बिहार के राजा कुँवरसिंह के दीवान थे। आप लोग ग़ज़ीपुर ज़िले के गोकुलपुर ग्राम के निवासी थे।
आपका ननिहाल शाहाबाद ज़िले के बनौरा ग्राम में था। वहाँ आपके नाना गिरधारीलाल रहा करते थे।

बाल्यावस्था एवं शिक्षा

आपका पालन-पोषण ननिहाल में ही हुआ। आपने बनौरा गाँव के पास के गाँव डुमरा में, माघ शुक्ला पंचमी संवत् 1925 वि. (1869 ई०) को जन्म लिया।
आप 16 वर्ष की आयु में सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर आर्यसमाजी बन गये थे।
अंग्रेजी में आपको बहुत अधिकार था और उसे बहुत प्रवाह के साथ बोलते थे। अंग्रेजी का आपने विशेष अध्ययन नहीं किया था, बल्कि आपने अंग्रेजी का अध्ययन केवल बाइबल पढ़कर ही किया था।
हिन्दी, उर्दू, संस्कृत आदि भाषाएँ भी आपने स्वयं ही सीखी थीं।
12 वर्ष की अवस्था में ही योग साधना में प्रवृत्त हो गये थे।

विवाह एवं पारिवारिक जीवन

आपका विवाह हुआ और आपने गृहस्थ जीवन व्यतीत किया। आपके दो पुत्र आत्मानन्द एवं अनन्तानन्द और दो पुत्रियाँ पद्मावती एवं मेधावती थीं। आपका एक भांजा विक्रमादित्य आपके पास ही रहता था।

पत्रकारिता एवं सम्पादन कार्य

आप 22 वर्ष की आयु में, 1890 ई० में, आर्यावर्त साप्ताहिक के सम्पादक बन गये थे। इसके बाद आपने भारत मित्र कलकत्ता का सम्पादन किया। 1907 में महात्मा मुन्शीराम जी (स्वामी श्रद्धानन्द) के साथ मिलकर “सद्धर्म प्रचारक” नामक पत्र का सम्पादन किया।

साहित्यिक योगदान

भारत का इतिहास (प्रथम भाग) का संकलन आपके द्वारा किया गया। 1903 से 1907 तक आप अजमेर स्थित वैदिक यन्त्रालय के प्रबन्धक रहे। महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में बाद में जो अप्रामाणिक संशोधन कर दिये गये थे, उनको दूर करके आपने मूल ग्रन्थ को पुनः प्रकाशित कराया।

धर्म प्रचार एवं सामाजिक कार्य

आपने हरियाणा में व्यापक प्रचार-कार्य किया। 15–16 वर्षों में लगभग दस हज़ार नये आर्यसमाजी बनवाये। आपने झज्जर, भैंसवाल, वृन्दावन आदि स्थानों पर कार्य किया। गुरुकुलों एवं सभाओं को लाखों रुपये की धनराशि पहुँचायी।

संन्यास जीवन

आपने 17 फरवरी 1925 को मथुरा में स्वामी श्रद्धानन्द जी से संन्यास लिया। इसके बाद आपने गुरुकुल भैंसवाल और झज्जर में आचार्य का पद सँभाला। आप वृन्दावन में भी अधिष्ठाता रहे।

स्वतंत्रता संग्राम एवं आर्यसमाज सत्याग्रह

हैदराबाद सत्याग्रह में भाग लिया। हरियाणा से अनेक सत्याग्रहियों को भेजा। आपने देश के विभिन्न भागों में आर्य समाज का प्रचार किया।

विशेष स्वभाव एवं रुचियाँ

आपका स्वभाव सरल, मधुरभाषी और स्नेही था।आप ब्रह्मचारियों से विशेष प्रेम रखते थे। आपके प्रिय फल में केला था।

अन्तिम समय

अक्टूबर 1942 में गुरुकुल झज्जर के कुलपति बने। अपने अन्तिम समय दिल्ली के दोवानहाल आर्य समाज में व्यतीत किया। 1948 के अन्त में लगभग 80 वर्ष की आयु में आपका देहावसान हुआ।

निष्कर्ष

स्वामी ब्रह्मानन्द जी का सम्पूर्ण जीवन देश सेवा, धर्म प्रचार और शिक्षा प्रसार में समर्पित रहा।
आपका योगदान आर्य समाज और वैदिक धर्म के इतिहास में अमिट है।