स्वामी से कौन नहीं माँगता ?

0
7

मा त्वा सोम॑स्य॒ गल्द॑या॒ सदा याच॑न्न॒हं ग्रा।

भृर्णि मृगं न सर्वनेषु चुक्रुधं क ईशानं न याचिपत

।। ऋः ८.१.२०

तर्जः मी गाता ना गीत तुला

हे इन्द्र सदा मैं कुछ ना कुछ तुझसे माँगूँ।
खड़ा रहा मैं झोली पसारे
॥ हे इन्द्र॥

कभी तुझसे आत्मबल माँगूँ तो कभी बुद्धि
कभी धर्म-कर्म-अभिलाषा
कभी शत्रु विजय, धनसम्पत्ति, कभी आत्मशक्ति
तुझसे ये पाते हैं सारे ॥
॥ हे इन्द्र॥

मैं संकट में साहस करता, धैर्य विपत्ति में
दस्तक तेरे द्वार पे देता
कभी वैयक्तिक कभी सामाजिक उन्नति में
मैं बढ़ता तेरे ही सहारे ॥
॥ हे इन्द्र॥

तुम विश्व सम्राट हृदय-मन्दिर के राजा
तुझ नृप को शीश नवाऊँ
तुझसे ना माँगू तो फिर मैं किससे माँगूँ ?
हम बैठें तेरे आधारे ॥
॥ हे इन्द्र॥

मैं प्रातः सायं सोमयज्ञ को रचाऊँ
मैं यजन का शिविर चलाऊँ
वाणी का क्षारण, निज भक्ति से मैं पाऊँ
करो शुद्ध विचार हमारे॥
॥ हे इन्द्र॥

कहीं माँगते माँगते कुपित तुझे ना कर दूँ
तेरे रुद्र रूप से हूँ डरता
मुझ याचक-सम्मुख सिंह रूप ना धरना
क्यों ना सौम्यरूप से उबारे ॥
॥ हे इन्द्र॥

पुरुषार्थी बनकर, केवल तुझसे ही माँगूँ
पुरुषार्थी का तू प्रणेता !
क्यों भाग्य सहारे आलसी जीवन जीता?
हम क्यों न बनें तेरे प्यारे ॥
॥ हे इन्द्र॥

मैं माँगूँ आप कृपा कर देते ही रहना।
कर जोड़ यही है कहना
स्वामी-सेवक का रहे परस्पर ये नाता
बिन हिचक आया तेरे द्वारे ॥
॥ हे इन्द्र॥

(क्षारण) शुद्ध करना, पवित्र करना। (शापित) क्रोधित। (दस्तक) खटखटाना। (वैयक्तिक)
व्यक्ति सम्बन्धित। (नृप) राजा। (यजन) यज्ञ करना। (रुद्र) दण्ड देने वाला महेश्वर।
(सौम्य) शांत, शीतल। (प्रणेता) नेता। (हिचक) शर्म, लज्जा। (कुपित) क्रोधित।