सुनो ऋषिवर दयानन्द की अमर कहानी
तर्ज: सुनो छोटी सी गुड़िया की…
सुनो ऋषिवर दयानन्द की अमर कहानी
ना ये गाथा किसी युग में होगी पुरानी ॥ सुनो ऋषिवर…
टँकारा पे प्रकाश दीप जगमगा उठा
सूर्य गगन का मानों धरती पे आ बसा
घर भी सानन्द मानो छाया वसन्त था (2)
मूलशंकर जन्मा हर्ष की आई दिवाली ॥ सुनो ऋषिवर…
अरमान था पिता का पुत्र शिवभक्त हो
शिव की प्रतिमा पूजा में ही अभ्यस्त हो
प्रश्न उठे मन में कई मूर्ति से श्रद्धा गई
मूर्ति पूजा ना करने की बात ही ठानी ॥ सुनो ऋषिवर…
पिता कहे नास्किता पुत्र में समाई
वर्षों की शिव भक्ति धूल में मिलाई
लानत दुत्कार मिली चाटें फटकार मिली
माँ की ममता कहती माफ कर दो नादानी ॥ सुनो ऋषिवर…
बहन चाचा जब गुजरे अचरज में डूबे
सोच लिया मृत्युभय से कैसे हम जूझें
आत्मा वैरागी था शिव का अनुरागी था
सच्चे शिव कीथी निजमन में ज्योत जलानी ॥ सुनो ऋपिवर..
माता पिता ने देखी पुत्र की विरक्ति
पुत्र के लिए कर दी वधु की नियुक्ति
मन का तूफान उठा बेचेनियों में ढला
बाल पंछी उड़ा, कर गया सूनी अटारी ॥ सुनो ऋषिवर.
गायब था पुत्र घर से सारे घबराए
चारों ओर बेतहाशा सेवक दौड़ाए
शोक था बेचेनी थी आँखे अश्रुभीनी थी
घर के कोने कोने में थी छाई विरानी ॥ सुनो ऋषिवर…
लुकते छिपते बालक ठहरा सरायों में
जो कुछ था पास ठगों ने ठगा ने राहों में
राह बड़ी दुर्गम थी काटों सी निर्मम थी
अपने बल पे बालक को थी मंजिल पानी ॥ सुनो ऋषिवर…
मुक्ति की चाहत में भटका वर्षों तक
लहुलुहान जख्मों से झुलसे कदमों तक
बन पर्वत खाई थी जान पे बन आई थी
कभी काँटों ने घेरा, कभी पाया ना पानी ॥ सुनो ऋषिवर…
मुक्ति की राह ज्ञान पाके भी मिली ना
ज्ञान की अधूरी कली बाग में खिली ना
दूर तो मंजिल थी पर आस तो प्रतिपल थी
धर्म वीरों को धीरज में होती आसानी ॥ सुनो ऋषिवर..
डाल हो संकल्प की तो ज्ञानपुष्प मिलता है
जिसका माली ईश्वर हो उसका चमन खिलता है
अग्नि श्रद्धा थी और आत्मा समिधा थी
बड़भागी ऋषि को मिले विराजानन्द स्वामी ॥ सुनो ऋषिवर…
द्वार खटखटाया ये पहला अवसर था
अन्दर गुरूवर बैठे चेला यहाँ तत्पर था
शिष्य में प्रतिभा थी, संकल्प नम्रता थी
नेत्र विन शिष्य की गुरू ने प्रतिभा जानी ॥ सुनो ऋषिवर…
जो भी ग्रन्थ लाए हो, गंगा में बहाओ
ये गुरू का आदेश पहले तुम निभाओ
आज्ञा का पालन से गुरु भक्ति धारण कर
पूर्व ज्ञान समेट गया गंगा का पानी ॥ सुनो ऋपियर..
मेधावी गुरू का मेधावी चेला था
जो भी सबक पढ़ा सुना ना कभी भूला था
गुरू दृष्टि गहरी थी शिष्य पे ठहरी थी
जाना गुरूवर ने होगा दयानन्द ही नामी ॥ सुनो ऋषिवर…
गुरूवर ने अष्टाध्यायी की शिक्षा दी
वेदों के व्याकरण की गुरू ने विद्या दी
मेधावी बुद्धि से शिक्षा पूरी की
विरजानन्द की कृपा से दयानन्द हुए ज्ञानी ॥ सुनो ऋषिवर…
लौंग दक्षिणा में दयानन्द ले के आए
जानते थे लौंग गुरू को सदा से ही भएर पर क
पर गुरू को जग के अन्धकार की चिन्ता थीकी
शिष्य से गुरु ने यज्ञरूप दक्षिणा माँगी ॥ सुनो ऋषिवर…
सही गुरू दक्षिणा दो कहा विराजानन्द ने र के
वेद ज्योति को जला दो जग के आँगन में
निज सुखों की आहुति दो जग को दो जागृतिकारी
वेद के प्रकाश हेतु माँगी सारी जवानी ॥ सुनो ऋषिवर…
आए ऋषि प्रथम वहाँ कुम्भ का मेला था
ओ३म् ध्वज था कर में पर ऋषि अकेला था
देख ऋषि ने पाखण्ड वेदकी छेड़ी जंग की
आओ ओ३म् के झंडे तले विश्व के प्राणी ॥ सुनो ऋषिवर…
भिन्न-भिन्न मतवादियों का बोलबाला था
नासमझ थे लोग लगा बुद्धि पे ताला था शिला कि
एकजूट समाज न था, ना ही ज्ञानाभास था का कि
धर्म के ठेकेदार बने लोभी अज्ञानी ॥ सुनो ऋषिवर..
ढोंगी फरेवीयों को ऋषि ने ललकारा
ठगते हो मासुमों को,कहके फटकारा
बड़े शास्त्रार्थ हुए सत्य ज्ञान तर्क हुए
मुँह की खानी पड़ी जीती वेदों की वाणी ॥ सुनो ऋषिवर..
मनमानी जब फरेबीयों की चल सकी ना
नियत ऋषिवर के प्रति उनकी थी भली ना
वार किए पत्थरों के दिए प्याले जहरों के
स्वार्थीयों ने चाही ऋषि की हस्ती मिटानी ॥ सुनो ऋषिवर..
ऋषि सत्य संग्रामी वैदिक धर्मी थे
सोमी मनायु सुप्रावी सुक्रत कर्मी थे
अद्भुत शक्ति ऋषि की दया में सनी थी
ना था वैर द्वेष और ना थे वो अभिमानी ॥ सुनो ऋषिवर..
हिन्दु सिक्ख जैनी मुसलमान ईसाई थे
समदृष्टि थी ऋषि की सब उनके भाई थे
सत्य बात कहनी थी मित्रता भी रहनी थी
दया करुणा और प्रेम भरी दिव्य थी वाणी ॥ सुनो ऋषिवर..
गौ हत्या देख दयानन्द व्यथित हुए
मूक प्राणियों के प्रति हृदय से द्रवित हुए
हत्या विरोध किया पालन पे जोर दिया
गौ करुणा निधी में थी हृदय की वाणी ॥ सुनो ऋषिवर…
वेद के प्रचार में सदा ही रहे अनुरत
ग्राम ग्राम नगर नगर जले वेद दीपक
ज्ञान के प्रकाशक समाज सुधारक थे
सारे विश्व में फैला दी वेद की वाणी ॥ सुनो ऋषिवर…
विधवा नारी को जब देखा सती होते
दयाकंद स्वामी कैसे चैन से यूँ सोते
नारियों को मान दिया उनका उत्थान किया
वेद विद्या उनको जरूरी समझी पढ़ानी ॥ सुनो ऋषिवर…
दिल में अरमान था स्वतन्त्र होवे भारत
देश की आजादी के थे प्रथम विचारक
देश की स्वायत्ता के दयानन्द नायक थे
कैसे ऋषिवर ने बात भविष्य की जानी ॥ सुनो ऋषिवर…
ऋषि दयानन्द ब्रह्मचर्य का शोला था
शेर सी दहाड़ में भी शिशु सा भोला था
वीरों की खूबी थी पर दया में डूबी थी
सत्य दृढ़ता अभय में थे अभिरामी की निशानी ॥ सुनो ऋषिवर..
छोड़ी न कसर वेद के प्रचार में
वेद के आदेश रूप ऋषि के व्यवहार धे
चाहते थे ऋषि धर्म आर्य संस्कृति
‘वसुदेव कुटुम्बकम’ हों जग के सुजानी ॥ सुनो ऋषिवर.
तोड़ दिए कुप्रथाओं के ऋषि ने घेरे
दूर किए छुआछूत के विकट अन्धेरे
लोक कल्याण के हित त्याग दिए निज सुख
दीन दुःखियों के कष्ट दूर करने की ठानी ॥ सुनो ऋषिवर…
इट के अभय खड़ा विरोधियों से वो अड़ा
अन्याय पाखण्ड ढोंग से लड़ना पड़ा
हाथ में न खंग न ही रक्षा को ढाल थी
आत्मशक्ति थी ढाल तलवार थी ज्ञानी ॥ सुनो ऋषिवर…
सत्य राह पर ऋषि अग्रसर कर्मठ थे
मिटे सत्यार्थ प्रकाश से सब भ्रम थे
जन्म से मुक्ति तक के शाश्वत नियम थे
पढ़ा ग्रन्थ, अज्ञानी भी हो गए ज्ञानी ॥ सुनो ऋषिवर…
लोभियों ने दुर्मन से ऋषि पर उपहास किए
दुराचारियों ने तो हिंसा के प्रयास किए
खन्जरों से वार किए जहर पे जहर दिए
फिर भी स्वामी दयानन्द रहे सत्य के हामी ॥ सुनो ऋषिवर…
प्याला अन्तिम जहरका उन्हें अमर कर गया
एक बुझा दीप तो क्या लाखों जला कर गया
घातक पे की कृपा, दया फूट रो पड़ी
दयानन्द से दया ने अनन्तता जानी ॥ सुनो ऋषिवर…
साधकों में थे निराले और महर्षियों में
दयावानों में निराले और व्रतियों में
योगियों में थे निराले और त्यागीयों में
सन्तों शिष्यों गुरुओं में निराले थे स्वामी ॥ सुनो ऋषिवर…
तपस्वियों में निराले वैरागीयों में
समाज सुधारकों में ब्रह्मचारियों में
वेद भाष्यकारों में वेद प्रचारकों में
युगप्रवर्तकों में उनका ना कोई भी सानी ॥ सुनो ऋषिवर…
अगणित उपकार किये अनगिन उपहार दिये
अगणित अधिकार दिये अनगिन सुविचार दिये
अगणित आचार दिये अनगिन व्यवहार दिये
लिखते लिखते जाएगा हार ‘ललित सहानी’ ॥ सुनो ऋषिवर…
(सोमी) जिसके पास कोई पदार्थ हो वह न उसका उपयोग करे ना उपभोग । सोम रखता हुआ
सोम वाँटे। स्वयंशान्त हो दूसरों को शान्त कर सके वही सोमी है (मनायु) भगवान का निरन्तर
मनन करनेवाला (सुप्रावी) श्रवण मनन से जानकर कि भगवान सबकी रक्षा करता है वैसा रक्षक
(सुकृत) उत्तम कर्म करने वाला ऋतगामी










