सुन करके मनन कर फिर आचरण

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सुन करके मनन कर फिर आचरण

सुन करके मनन कर फिर आचरण,
सिद्धान्त श्रेष्ठ सर्व विध्न हरण,
जो सुख चाहे और दुख से डरे,
वह पाप त्याग कर पुण्य करे,
धर्माचरण सब दुख हरे,
हो शुद्ध आत्मा अन्तः करण ।।1।।

विषय वासनाओं को जला,
इन्द्रियों को सन्मार्ग में चला,
दुष्टों से दूर रहना भला,
सत्संग जीवन है कुसंग मरण।।2।।

स्तुति निन्दा लाभ हान,
हर शौक हर्ष समझे समान,
पंचम श्रद्धा षट समाधान,
है मार्ग सुगम भव पार तरण।।३।।

पृथ्वी से परमेश्वर पर्यन्त,
समझें सृष्टि का आदि अन्त,
मुमुक्षु प्रेमी साधु सन्त,
अनुकूल बनाले वातावरण ।।4।।