गोभिरिष्ट रेमामतिं दुरेवा यवेन क्षुधं पुरुहूत विश्वाम् ।
वयं राजाभिः प्रथमा धनानि अस्माकेन वृजनेना जयेम ॥ ऋ. १०.४२-४४.१०
तर्जः पुलरीयल पुन्दीन्ग कुड़ तुन्न MP3 (राग-यमन)
अमति, निर्धनता, त्रुटियाँ और क्षुधा दूर करो
हे पुरुहूत इन्द्र! हम उलझे जीवन में,
हे प्रभो! प्रेरक सहायक तुम बनो —
तुमको पुकार रहे, आओ विपदा हरो।
प, प, मप, पपमप आ 5555
सासा रे ग पमगरे नीरेग, सा, रे ग
धनीरे, धनीरे, धनीरेग, म सां नी पम रे, सा ऽ
हम नहीं चाहते हैं कि पंगु बनें,
इसलिए प्यारे प्रभु! हममें उद्यम भरो।
अपनी त्रुटियों से भी सीखते ही रहें —
आप इसमें हमारे सहायक बनो।
निर्धनता, अमति, क्षुधा दूर करो। (2)
क्षेमकारक प्रभु! सबका कल्याण करो।
॥ अमति… ॥
मन में जब अविद्या घर कर ले कभी,
और कर्तव्य–अकर्तव्य में हो भ्रम —
दुराचरणों से गिरने न दें,
वेद विद्या के शुभ ज्ञान से प्रेरित करो,
वेद विज्ञान से मेधा–प्रज्ञा बढ़े। (2)
ऐसे कल्याण की वर्षा हम पर करो॥
॥ अमति… ॥
तन न ना, न, तन नना, न, त, न, तन नना, तनन तननना, त न न नन ना ऽऽ
मन में होवे अविद्या प्रभु जब कभी
और कर्तव्याकर्तव्य की हो कमी
होते जाते दुराचरण से जब पतित
वेद विद्या के शुभ ज्ञान से हों प्रेरित
वेद विज्ञान से मेघा-प्रज्ञा बढ़े (2)
॥ अमति… ॥
ऐसे कल्याण की वर्षा हम पे करो॥
जब हमारा समाज क्षुधा से तड़पे
अन्न धन धान्यों से आप भण्डार भरें
वेद में पञ्च वर्ग की हैं औषधियाँ
प्रोत्साहन कृषक को भी देते रहें
सच्चे गोधन, धन को कमाते चलें (2)
और निर्धनता राष्ट्र की दूर करें।
अमति…
अपने लक्ष्य पे जब हम तो चल ही पड़े
प्रभु आप भी इसमें सहायक बने,
सारी ऋतुओं में कल्याण-नूर भरें,
हम सबों को समृद्धि से पूर करें
अपने उद्योग से खुद को उन्नत करें (2)
और राष्ट्र सेवा में भी तत्पर रहें ॥
अमति…










