सुखकारी बना

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सुशेवों नो मृठ्याकुरदृप्तक्रतुरवातः । भवां नः साम् शं हृद

।। ऋ. ८.७६.७

तर्जः मारा घटमा विराजता श्री नाथ जी

हमारे हृदयों में आकर समाओ जी
प्रभुजी! प्यारे प्रभु जी !
॥ हमारे॥

इन हृदयों को सोम रस पिलाओ आत्मन्
शांत सुखमय हे सोम ! बना दो जीवन
हमारे प्राण जीवन॥
॥ हमारे ॥

जिनके हृदय रहे हैं अभिमान से भरे (2)
क्षुद्र चञ्चल हैं जो तेरे ज्ञान से परे (2)
जो ना करते हैं अपना आपा अर्पण
वो कैसे पायें दर्शन ॥
॥ हमारे॥

विषरूपी विषय त्याग देवें सभी (2)
अभिमानी तो मानव बनो ना कभी (2)
सदा तन मन हों तुझपे वारी रे
वारी हे प्यारे भगवन्!
॥ हमारे ॥

सोम-रस से हुए हैं शांत हृदय प्रभुजी (2)
मदहीन सुखी हैं हर समय शम्भुजी (2)
ज्ञान-कर्म की शक्ति है नम्रतामयी
जिनके हरि हो तुम॥
॥ हमारे ॥

हम सबकी विनय प्रार्थना तुम सुनो (2)
सबके हृदयों में सौम्यता, सरसता भरो (2)
सोम-रस देके हृदयों को शांत करो
हे दुःख भञ्जन !
॥ हमारे ॥

(क्षुद्र) नीच, दुष्ट, अधम, तुच्छ। (सौम्यता) सरलता। (सोम) अमृत, ज्ञान, विद्या।
(भञ्जन) बीमारी रोग अस्वस्थता।