बहन सुभाषिणी देवी, जिन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था भक्त फूलसिंह महाराज की सुपुत्री श्रीमती सुभाषिणी का जन्म 14 अगस्त, 1915 माहरा गांव जिला सोनीपत में एक साधारण परिवार में हुआ । इनके पिता भक्त फूलसिंह जी ने 1920 से वानप्रस्थ ले लिया और उन्होंने शिक्षा और आर्यसमाज के हेतु अपने जीवन को अर्पित कर दिया।
इन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा कन्या गुरुकुल देहरादून, टैगोर के शान्ति निकेतन और बापू के साबर मति आश्रम में ग्रहण की। इन महान संस्थानों का प्रभाव इन के मस्तिष्क पर गहरा पड़ा और इन्होंने अपने ढंग से एक आश्रम की शुरुआत करने की योजना बनाई ।
धन का अभाव होने के कारण इन्होंने जीन्द में सन् 1935 में राजकीय प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापिका का पद संभाला और इस पद पर 1942 तक कार्य किया। इन्होंने अपने द्वारा उपाजित धन को अपने पिता को सोंप दिया। भक्त जी महाराज ने कन्याओं में शिक्षा की कमी देखकर खानपुर कलां में एक गुरुकुल की स्थापना की।
सन् 1942 में महात्मा फूल सिंह जी बलिदान हो गये और गुरुकुल को चलाने का उत्तरदायित्व इनके कन्धों पर आ पड़ा । इन्होंने अपने पिता के प्रशंसकों की इच्छा के विरुद्ध अपने राजकीय पद को त्याग कर खानपुर कलां के गहन जंगलों में गुरुकुल चलाया और गुरुकुल की सेवा में जीवन को व्यतीत करने की कसम उठाई। उस समय गुरुकुल में गिनती के तेरह विद्यार्थी थे और तेरह बीघा जमीन थी। इनके दृढ़ निश्चय को देखकर भक्त फूलसिंह महाराज के प्रशंसकों में चौधरी ईश्वरसिंह गहलोत, स्वामी नित्यानंद जी महाराज, कुंवर जौहरी सिंह जसराणा चौधरी माडूसिंह सिंह मलिक आदि आर्य सज्जन एवं भजनोपदेशकों ने मुख्य भूमिका निभाई। अन्न व धन की कमी होते ही उपदेशकों की भजन मंडलियाँ हरियाणा प्रांत में घुम घुम कर अन्न धन्न एकत्रित करती थी।
बहन जी ने अपने दृढ़ विश्वास और कड़ी मेहनत के आधार पर दूर-दूर जाकर लोगों को अपनी कन्याओं को गुरुकुल में निःशुल्क शिक्षा दिलाने के लिए राजी कर लिया । कन्याओं को सफाई और धुवाई सहित सभी निजी कार्य स्वयं करने पड़ते थे । इनके साथ ही उन्हें माध्यमिक शिक्षा की तैयारी करवाई जाती थी । वास्तव में ये आर्य संस्कृति का पाश्चात्य शिक्षा के साथ सम्मिश्रण करने का अपने ढंग से प्रयोग कर रही थीं। सन् 1948 तक इनके पास छात्राओं की संख्या 200 थी और 400 बीघा जमीन थी ।
वर्षा ऋतु में कच्चे घरों और दल-दल जमीन से शिक्षा कार्य को नुकसान पहुँचता था, इन्होंने सन् 1949 में पक्के घरों को बनाने का फैसला किया। जब से इनके कदम इस दिशा में अग्रसर होते गये ।
इनकी छत्र छाया में इस प्रांगण में एक उच्च विद्यालय, एक बहुमुखी अध्यापक प्रशिक्षण महा विद्यालय एक स्नातक महा विद्यालय, एक आयुर्वेदिक महा विद्यालय और गृह विज्ञान महा विद्यालय थे – ये सभी महिलाओं के लिए होते थे। इनके अटूट प्रयास और त्याग के कारण ही आज खानपुर गांव जो हरियाणा के पिछड़े इलाके में स्थित, रेशमिक क्रियाओं से अंकृत, पक्की सड़कों से जुड़ा हुआ और सभी सुविधानों जैसे बिजली, पानी, सफाई, संचार और मनोरंजन आदि से पूर्ण है । वर्तमान में यह संस्था युनिवर्सिटी का रुप धारण कर अपनी ख्याती बखेर रही है।
हरियाणा में नारी शिक्षा के क्षेत्र में बहन सुभाषिणी जी का योगदान अद्वितीय है । वर्ष 1975 में बहन सुभाषिणी जी को केन्द्रीय सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। हरियाणा ही नहीं अपितु समस्त भारतवर्ष में बहन जी की प्रशंसा की गई। अपनी अंतिम सांस तक बहन जी इस संस्था को अपना श्रम प्रदान करती रही। धन्य है हरियाणा की बेटी।
साभार – समाज संदेश गुरुकुल भैंसवाल कलां का मासिक पत्र
























