सुबह शाम चिरैया बोले।
सुबह शाम चिरैया बोले।
तन घोंसले बाहर भी डोले।
ये चिरैया का नाम पता ना।
कब जागे ये और कब सोले ।। टेक ।।
कैसा अद्भुत् नीड़ है इसका।
भीतर बाहर भी हैं पोले ।। १।।
हवा का सागर, जल की गागर।
ब्रह्मित जीव के फेनिल चोले ।। २ ।।
चोले पे चोला चोले पे चोला।
अदृश्य चिरैया फिर भी बोले ।। ३ ।।










