अ॒हं भूमिमददा भार्य्यायाऽहं वृष्टि दाशुषेमर्त्याय ।
अ॒हम्पो अ॑नयं वाणश्नामम॑ दे॒वसो अनु केत॑मायन्।॥ ऋ. ४.२६.२
तर्जः पुरिक्किल नी परन्यू पदके परन्यू 949 (राग-मेघ मल्हार)
मनमानी करे क्यूँ
सन्ममार्ग पर चल तू
यज्ञकर कह दे इदन्नमम्
भाव निष्काम से जाग जा तू
॥ मनमानी॥
बनना ना कञ्जूस
त्याग का मार्ग है सूच
जीवन की नैया ना जाए डूब, आ 5555
अनुगामी प्रभु का हो तू
दया सागर हैं प्रभु
ज्ञान के सत्य पथ पे
कर कर्म तू
हर यज्ञ कर्म में शामिल हो तू॥
॥ मनमानी ॥
सूर्य चन्द्र अग्नि
ग्रह उपग्रह अवनी
सृष्टि नियम में हैं सब बंधे, आ 5555
मनमानी ये भला क्या करें?
ईशाज्ञा पे ये चलें
वृष्टि करते हैं प्रभु
इसलिए स्वार्थी कभी हो ना तू॥
॥ मनमानी ॥










