सूर्य किनके प्रति उदित होता है

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उद्धेद्भि श्रुतामधं वृषभं नर्यापसम्। अस्तारमेषि सूर्य ॥

ऋ. ८.६३.१ साम. १२५, १४५०

तर्जः पुन्नोड़ कुड़रिनी स्वरम

तुम आओ हृदय के प्राङ्गण में, हे विभासन्!
बना दो शुभ्र यह जीवन
जो करते हैं वेद-श्रवण तथा तदनुसार मनन,
निदिध्यासन में लीन रहकर करते दुरितों का निवारण,
और वसुधा को अपना कुटुम्ब मानते हैं हम —

प्रकाशरूप भगवन! सूर्यों के महा सूर्य तुम ॥ प्रकाशरूप


नर्यापस’, ‘श्रुतामघ’, ‘वृषभ’, ‘अस्ताप्रद’ —
परमेश्वर के ये भक्त बनते जाते हैं सशक्त,
जिनके लिए वेद-शास्त्र ही हैं अमूल्य धन।
जूझते रहते हैं वे विध्नों से —
आते रहें चाहे विषम बरसातें।
‘वृषभ’ बन विद्या, धन और धान्य
परहित केवल उनको है मान्य
उदित हो उनमें हे प्रीतम!

प्रकाशरूप …….


चाहें हम तो एक साथ चारों अमूल्य धन वरें,
अधकचरे ज्ञान वालों की भटकन को हरें।
अपने ‘सूर्य सम’ प्रभु के दिव्य आलोक में
कदम रखते हुए बैठें उसकी गोद में।
परमेश्वर की न लगे केवल रट –
चारों कर्मों में सदा रहें रत —
यही तो है परमात्म-स्मरण।

प्रकाशरूप ….

(श्रुतामय) वेद शास्त्र तथा उपदेश को धन मानने वाले (नर्यापस) नर हितकारी कर्म

करने वाले। (वृषभ) बरसाने वाले, विद्या-भौतिक सम्पदा दूसरों पर बरसाने वाले।

(अस्ताप्रद) विध्न बाधा को दूर फेंक देने वाले मनुष्य के।