अर्षा सोम द्युत्तमोडमि द्रोणानि रोरुवत् । सीदन्यौनौ वनेष्वा ॥
साम. ५०३, ७७४ ऋ. ७.६५.१९
तर्ज : काली काली रात- भू.बि.न
सूखा काठ सा हर इक अङ्ग सताए (2)
क्यों न रस टपकाए (2)
कभी काठ के कलशों में सरस रस भरा था
मधुर ध्वनि उठती जीवन रस में रसा था
अब गूंज ना सुनाए, ॥ सूखा काठ…
मेरी देह की अर्घट में लोटे लगे हैं
पर वे तो चुप्पी साधे औधे पड़े हैं।
ना अमृत छलकाए ॥ सूखा काठ…
मैने जगाया है पर जागा नहीं ये मन
ऊंजड़ अन्धेरी रातें और हुईं दुर्गम
तो कैसे चैन पाएँ ॥ सूखा काठ…
सूखा काठ सा हर अङ्ग सूखा काठ सातनमन
सूखा काठ सा जीवन जिसमें ना समर्पण
प्रभु कैसे नज़र आए ॥ सूखा काठ..
सूखे काठ में दुरित के दीपक लगे हैं
तिलतिल करके काठ को खाए जा रहे हैं
है अन्त हाय ! हाय । सूखा काठ..
आसवारी सी मीठी तान हृदय में
स्तोत्र भक्तिरस का जागे भक्त के प्रणय में
भक्त को भक्ति भाए? सूखा काठ…
मेरी आँखों के तारे प्यारे परमेश्वर
दुरित हरके लहर जगा दो मेरे मन के भीतर
रसीला रस रसाए ॥ सूखा काठ…










