सोम रारन्धि नौ हृदि गावो न यव॑सेप्वा। मय॑ इव॒ स्व ओक्यै ॥
ऋ. १.८१.१३
तर्जः पायो जी मैंने राम रतन धन
प्रभु जी आओ हृदय में प्रेम बहा दो, (2)
जीवन सार तुम्हीं हो सद्गुरु
अन्र्तभाव जगा दो। (प्रभुजी आओ)
॥ प्रभुजी आओ॥
स्वार्थ रहित हृदय निर्मल हो (2)
तब तुम आन विराजो ॥ प्रभुजी आओ॥
झूठ असंयम हिंसा ना भाये (2)
राग-द्वेष हटा दो। (प्रभुजी आओ)
॥ प्रभुजी आओ॥
बसा बसाया घर सुख देवे (2)
खुद को इसमें बसा लो (प्रभुजी आओ)
॥ प्रभुजी आओ॥
भक्ति का रस जो मैंने जुटाया (2)
आकर प्रेम से चाखो॥ (प्रभुजी आओ)
॥ प्रभुजी आओ॥
ये मद-हीन हृदय अब तेरा (2)
सोम-निवास बना लो। (प्रभुजी आओ)
॥ प्रभुजी आओ॥
शुद्ध हृदय में रमण करो प्रभु
देवयाव हृदय पायो। (प्रभुजी आओ)
॥ प्रभुजी आओ॥
हर जीवन प्राणों में बसना
मिलन महाय बना लो। (प्रभुजी आओ)
॥ प्रभुजी आओ॥
(मद-हीन) अभिमान रहित। (सोम) आत्मा की आत्मा, परमात्मा। (रमण) क्रीड़ा, किलोल,
हंसी, दिल्लगी। (देवयाव) दिव्यता प्राप्त। (हृद) हृदय। (महाय) विशाल










