ओ३म्।आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन।
महे रणाय चक्षसे ।।१।।
अथर्ववेद १.५.१
भावार्थ- ये जल सुख प्रदान करने वाले, बल-उत्साह प्रदान करने वाले और अत्यन्त रमणीय रूप को देने वाले हैं।
ओ३म्। यो व: शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह न:।
उशतीरिव मातर: ।।२।।
अथर्ववेद १.५.२भावार्थ- जैसे मां बच्चों का कल्याण करती है उसी प्रकार जलों के कल्याणकारी रस को हम प्राप्त करें।
ओ३म्। अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा।
अग्निं च विश्व शं भुवम् ।।३।।
अथर्ववेद १.६.२भावार्थ- परमेश्वर ने वेद मन्त्रों के माध्यम से यह बताया है कि जलों के अन्दर रोग निवारक एवं आरोग्य दायक शक्ति है तथा विश्व का कल्याण करने वाली अग्नि विद्यमान् है।










