परिप्रासिष्यदत् कविः सिन्ध्योरूर्मावधि श्रितः ।
कारूं विभ्रत पुरुस्पृहम् ॥
ऋ ६.१४.१, साम. ४८६
तर्जः दूर किनारा राहिला (सू.सू.मा।)
आनन्द सिन्धु बह रहा, लहरों पे क्रीड़ा कर रहा है
इधर माँझी रे, ओ ऽऽ माझी रे (2)
इधर मैं न जाने, कब से खड़ा हूँ,नाव-सवारी को तरसा हूँ
शीघ्रता से जाके, प्रभु संग बैटू,स्तोता मैं बन के खड़ा हूँ
ये जलधारा, जीवनधारा ॥ हो माँझी रे…आनन्द सिन्धु…
सोम की महत्ता, यहाँ क्षुद्र मैं हूँ, पाँव आगे बढ़ते नहीं हैं
ध्यान है स्थिति पर, साहस नहीं है, नज़रे प्रभु पे टिकी हैं
ये जलधारा, जीवन धारा ॥ २ ॥ हो माँझी रे…आनन्द सिन्धु..
ललक है हृदय की, बनें प्रभु माँझी, प्यास भी तो कब से लगी है
प्रभु और मेरे बीच की दूरी, मन को ना सहन हुई है
ये जलधारा, जीवन धारा ॥ हो माँझी रे…आनन्द सिन्धु…
चिरकाल से ही प्यास भरी दृटि, सोम प्रभु की ओर भागे
सोम प्रभु कहते छोड़ दे चिन्ता, कुछ तू बढ़, कुछ मैं बढ़ता हूँ आगे
ये जलधारा, जीवनधारा ॥ हो माँझी रे… आनन्द सिन्धु…
सोम सच्चिदानन्द दयासिन्धु दानी, पवमान अनुपम कवि हैं
सत्काव्य को भी वही आँकते हैं, प्रेरणा की शक्ति अग्रणी है
ये जलधारा, जीवनधारा ॥ हो माँझी रे…आनन्द सिन्धु..
प्रभु-प्रेरणा से बढ़ रहा हूँ आगे प्रार्थी प्रभु का बन गया हूँ
स्तोत्र गान करके समर्पित हृदय से, सत्काव्य को समझ रहा हूँ
ये जलधरा जीवन धारा ॥ हो माँझी रे…आनन्द सिन्धु…
अब तो लग रहा है, बने प्रभु माँझी नाव मेरी आगे कर रहे हैं
अधिक मुझसे शायद प्रसन्न वो हुए हैं, दोष मेरे सारे रहे हैं
ये जलधारा जीवन धारा ॥ हो माँझी रे…आनन्द सिन्धु…
मुझे मेरे माँझी पवित कर रहे हैं, हाथ आशीस के सर पे हैं
आनन्द-सिन्धु में झुला करके मुझमें, लहरों की मस्ती भर रहे हैं ।
ये जल धारा, जीवनधारा ॥ हो माँझी रे… आनन्द सिन्धु…
क्रीड़ा खेल, लीला, सोम-अमृत, ललक उत्कृष्ट इच्दा, बहुत चाह, पवमान अत्यन्त पवित्र दूसरों
को भी पवित्र करने वाला, स्तोत्र- स्तव स्तुति, स्तुतिगीत, पवित-शुद्ध, पवित्र, विमल, सत्काव्य-संसार
रूपी शिक्षा प्रद ज्ञानवर्धक काव्य










