ऋतं वदन्तृतद्युम्न सत्यं वदन्त्सत्यकर्मन् । श्रद्धां वदन्त्सोम राजन् धात्रा सोम परिष्कृत इन्द्रायेन्दो परिस्रव ।। ऋ० ६।११३।४
स्वामी सत्यानन्द का जन्म संयुक्त प्रांत के शाहजहाँपुर जिले में सन् १८६० ई० में हुआ था। बचपन से ही उनकी प्रवृत्ति धार्मिक थी। घर पर उन्होंने उर्दू फारसी पड़ी थी। फारसी के वे अच्छे विद्वान् थे ।
गृहस्थाश्रम के बाद उन्होंने संन्यास धारण किया और अपना नाम सत्यानन्द रखा। इसके बाद उन्होंने पैदल तीर्थभ्रमण प्रारम्भ किया। युक्तप्रान्त, बिहार, बंगाल होकर पुरी पहुंचे। वहां पर चातु मास किया। वहां से मद्रास की ओर चलकर अनेक तीर्थस्नान, देवदर्शन, सन्त-सत्संग करते हुए रामेश्वर पहुँचे । जाते हुए वे पूर्व तट से गये थे लौटते वक्त उन्होंने पश्चिम तट का मार्ग पकड़ा । भ्रमण करते हुए हम्पी में आये। विजयनगर के खंडहर, पम्पासर, सुग्रीवादि के स्थान देखकर वहां ठहरने का निश्चय किया। कई वर्ष वहां तथा आस पास घूमकर बिता दिये।
भ्रमण के समय में इन्होंने आत्मसन्तुष्टि तथा सत्यान्वेषण के लिये विभिन्न धर्मों का पर्यालोचन भी किया था। आर्यसमाज की ओर उनका आकर्षण हो चुका था। एक बार जब ये मैसूर राज्य में भ्रमण कर रहे थे, उन दिनों श्री स्वामी श्रद्धानन्द जी वहां गये। इनसे उनकी अकस्मात् भेंट होगई । श्री स्वामी जी ने इन्हें आर्यसमाज का प्रचार करने की प्रेरणा की। इन्होंने स्वीकार कर लिया। इनमें संन्यासियों के भूषण नम्रता और सेवाभाव विद्यमान थे। सहिष्णुता भी प्रचुरमात्रा में विद्यमान थी । अपनी बात पर दृढ़ रहने का उनका स्वभाव था ।
प्रचार के लिये उन्होंने दक्षिण भारत को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। होसपेट को मुख्य केन्द्र बना-कर दो वर्ष तक कर्नाटक में प्रचार करते रहे। स्वामी सत्यानन्द जी यतः वक्ता न थे, संस्कृत से भी अनभिज्ञ थे अतः मौखिक प्रचार ही किया करते थे।
सन् 1918 में प्रैसूर नगर में पधारे। वहाँ के प्रसिद्ध व्यापारी स्वर्गीय धर्मप्रकाश, डी० बनुमीआ और बा० सुखानन्द जौहरी ने उन्हें बड़े आदर सत्कार के साथ ठहराया। कर्नाटक के इस प्रधान नगरमें स्वामी जो ने अपने तीन वर्ष वदिक धर्म के प्रचार में लगाये इसी बीच में वे बहुत से आदमियों के सम्पर्क में आये ।
इसके पश्चात् उन्होंने ६ जनवरी १९२१ को बंगलौर में पदार्पण किया। वहां बाजार स्ट्रीट, बसर्वां गुड़ी में आर्यसमाज की स्थापना की। ९ जनवरी 1922 को उन्होंने आर्यसमाज की संरक्षकता में “श्री दयानन्द-ब्रह्मचारी श्राश्रम” की स्थापना की। बहुत से ब्रह्मचारो इस आश्रम में प्रविष्ट हुये और उन्होंने ब्रह्मचर्य की उच्चभावना और वैदिक धर्म की सुधा का पान कर अपना जीवन सफल किया ।
श्री स्वामी श्रद्धानन्द जी ने जो 1924-25 में दक्षिण भारत का दौरा किया था उसका अधिकांश श्रेय श्री स्वामी सत्यानन्द जी को है। इन्हीं के अनुरोध और आग्रह से वे दो बार बंगलौर पधारे। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने बंगलौर की जनता के सामने बहुत ओजस्वी व्याख्यान दिये। इन व्याख्यानों ने मैसूर राज्य तथा बंगलौर में आर्यसमाज के निर्माण में नींव का काम किया ।
सार्वदेशिक सभा की ओर से पं० सत्यव्रत जी तथा पं० देवेश्वर जी प्रचारक के जाने पर स्वामी सत्यानन्द जी ने उनकी सहायता की और उनके प्रचार का प्रबन्ध किया ।
जब स्वामी श्रद्धानन्द जी का बलिदान हुआ तो उनके शोक में २३-१२-1926 को स्व० डा० सर के० पी० पट्टन चेट्टी के सभापतित्व में एक बड़ी भारी सभा की गई। स्वामी जी ने उसमें यह प्रस्ताव पास करवाया कि श्री श्रद्धानन्द जी की स्मृति में एक भवन बनाया जावे। इस प्रस्ताव की पूर्ति करने के लिये वहाँ के प्रसिद्ध व्यापारी श्रीमान् मन्दालप्पा के सुपुत्र श्रीमान् टी० एम० तिमिश्र सर्वप्रथम आगे आये। स्वामी जी की स्मृति में एक सुन्दर भवन बनाने के लिये उन्होंने विश्वेश्वरपुरम् में ‘सीट नं० २४७’ दान में दिया। आर्यसमाज ने कृतज्ञता के साथ इस दान को स्वीकार कर लिया ।
इसके बाद भवन-निर्माणार्थ धनसंग्रह के लिये एक लम्बी यात्रा की। इसमें सन्देह नहीं कि यदि वे इस कार्य को हाथ में न लेते तो वह अधूरा रह जाता। मैसूर, बंगलौर, मद्रास, हैदराबाद और उत्तर भारत के स्थानों से वे दस हजार रुपया एकत्र कर लाये। श्री श्रद्धानन्द बलिदान भवन की ग्राधारशिला २५-६-1930 को सर के० पी० पट्टन चेट्टी के द्वारा रक्ली गई है। स्वामी जी ने अनवरत परिश्रम करके 1931 में इस भवन को सम्पूर्ण बना दिया। बंगलौर का आर्यसमाज भी इसी नूतन भवन में आगया । २४ मार्च 1939 तक स्वामो जी इस आश्रम की उन्नति में सर्वात्मना लगे रहे।
हैदराबाद सत्याग्रह आन्दोलन प्रारम्भ होने पर स्वामी जी ने अपने आपको उसमें डुबा दिया। उस समय उनकी आयु ७६ वर्ष की थी। एक दिन उन्होंने स्वयं सत्याग्रह में जाने का निश्चय कर लिया। उनके इस निश्चय को जानकर उनके हितैषियों, प्रेमियों और मित्रों को बिजली का झटका सा लगा। उनकी वृद्धावस्था को सामने रखकर लोगों ने उन्हें रोकने की बड़ी कोशिश की पर असफल रहे। २४ मार्च सन् 1939 की रात को शोलापुर चल दिये।
मेरे साथ उनका पुराना परिचय था। जब मैं पंजाब के दयानन्द उपदेशक विद्यालय का आचार्य था तब भी मुझसे स्वामी सत्यानन्द जी कई बार मिल चुके थे। मैंने उनसे कहा कि-आपका कर्णाटक में परिचय है। आप वहां जाकर सत्याग्रह की वास्तविक स्थिति लोगों को बतलायें। निजाम के अत्याचार और आर्यसमाज की माँगों का औचित्य समझायें ।उन्होंने कुछ दिन जाकर फिर प्रचार किया और शोलापुर लौट आये। मुझसे कहने लगे मेरा वित्त सत्याग्रह करना चाहता है। आप आज्ञा दें ताकि में सत्याग्रह करू। मैंने कहा श्राप वृद्ध हैं. जेल में कष्ट होगा। इन्होंने उत्तर दिया आर्यसमाज के लिये यदि मेरा शरीरान्त भी हो जाये तो मुझे प्रसन्नता होगी। इस समय आर्यसमाज ने सव आर्यों को सत्याग्रह के लिये आह्वान किया है मेरा कर्तव्य है कि में सत्याग्रह करू । परन्तु मैं इन्हें रोकता रहा।
अन्त में वानप्रस्थाश्रम ज्वालापुर का जत्था आगया। इनके बार बार के आग्रह करने पर मैने इन्हें उस जत्थे के साथ जाने की अनुमति दे दी। स्वामी पूर्णानन्द जी के नेतृत्व में जत्थे ने गुलबर्गा में जाकर सत्याग्रह किया। वहां सब बन्दी बनाये गये और नौ महीने का कारागार का दण्ड उन्हें मिला ।
जब सत्याग्रह का दिन आया तब उन्होंने मुझ को ३०) तीस रुपये लाकर दिये। मैंने पूछा-यह इसे हैं? उन्होंने कहा-यदि में इस शरीर से पुनः आपको मिला तो ले लूंगा नहीं तो आप जहां चाहें यहां दे दें। मैंने हंसकर कहा-क्या शरीर छोड़ने का विचार है? उनका उत्तर मिला- यदि इस आयु में धर्म-शहादत प्राप्त हो जाये तो में अपनी खुशकिस्मती समभुंगा ।
गुलबर्गा से वे चञ्चलगुडा जेल में बदल दिये गये। श्री नारायण स्वामी जी के कारण गुलबर्गा में नित्य हवन होता था परन्तु यहां की जेल वाले उसके कट्टर शत्रु थे। हवन पर ही यहां भूख हड़ताल हो गई। हड़ताल तो वह समाप्त हो गई परन्तु उसके प्रारम्भ करनेवाले स्वामी सत्यानन्द जी पर जेल बालों की शनि दृष्टि पड़ गई। उन्होंने अपमान करना, कोठरियों में बन्दकर देना, खराव भोजन आदि प्रत्यक्ष-दण्ड प्रारम्भ किया । अप्रत्यक्ष दण्ड अलग देते थे। स्वामी जी कष्टों को प्रसन्नतापूर्वक झेलते रहे। वे कहते थे-तू तीर आजमा हम जिगर आजमाएं ।
शरीर लगभग ८० वर्ष का वृद्ध हो चुका था। उधर १२ दिनों की भूख हड़ताल, इधर ऊपर से कष्टों की भरमार। जब वोर परोपकारी आत्मा ने देखा शरीर अब कष्टसहिष्णु नहीं रहा तो उसने बिदा माँगी और ब्रह्मधाम को चला गया।
एक वीर पुरुष की तथा देश जाति के एक सच्चे पुत्र की भाँति उनका शरीरान्त धर्म और देश के हित के लिये हुआ । जेल कर्मचारी इस घटना को दबाना चाहते थे. परन्तु किसी प्रकार पता चल गया कि कारा की काल कोठरी में किसी बन्दी का परलोक-प्रयाण हुआ है। आर्यसमाज हैदराबाद ने शव की याचना की। अधिकारी पहले तो टालते रहे पर जब देखा कि समाजी पिड छोड़नेवाले नहीं तो शव दे दिया गया। शव मिलने पर पता लगा कि यह स्वामी सत्यानन्द जी का है क्योंकि उनके अनेक बार के शुभागमन से हैदराबाद का प्रत्येक आर्यसमाजी उन्हें पहचानता था ।
२७ अप्रैल 1939 की शाम को उनका शरीरावसान हुआ था। आर्यसमाज हैदराबाद ने अम्बर पेठ की श्मशान भूमि में नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों की उपस्थिति में उनका वैदिक पद्धति से दाह संस्कार कर दिया ।
स्वामी जी का शरीर लम्बा और सुडौल था। शरीर देखने से ही युवावस्था की हड़ता का बोध होता था। निजाम सरकार सोचती होगी कि कष्ट देने से यह संन्यासी बश में आजायेगा परन्तु सम्भवतः उसे आर्यों के सनातन सिद्धान्त ‘आत्मा का अमरत्व और पुनर्जन्म’ का ज्ञान नहीं। उसे हाथ मलते रहने के सिवा कुछ न मिला। संन्यासी की हत्या का पाप उसके सिर चढ़ा ।डा० अंचोलीकर एम० बी० बी० एस० ने स्वामी जी की शव परीक्षा की रिपोर्ट में लिखा था कि “बांये कान के पास घाव था और आसपास खून जमा हुआ था। दांये कान के आसपास भी खून जमा था। आंख के पास, पीठ तथा बाहुओं के ऊपर कुछ काट के निशान थे।” जेल से शव लानेवालों ने भी उपरोक्त बातों का अपने वक्तव्य में उल्लेख किया था।










