श्री सत्यव्रत अग्निवेश

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(लेखक: वेदानन्द वेदवागीश)


आर्य समाज के आशा प्रदीप

श्री सत्यव्रत अग्निवेश आर्यसमाज के बढ़ते नवयुवकों में आशा प्रदीप थे, विधि ने यह दीपक उनकी २४ वर्ष की अवस्था में ही बुझा दिया। मित्रों को, परिचितों को प्रकाश के अभाव में एक गाढा-न्धकार दीखने लगा।

प्राण छोड़ने से लगभग दो वर्ष पूर्व से ही यह होनहार जवान रुग्णता की दशा में जाना प्रारम्भ हो गया था। युवकों को उठाने की लग्न में रात दिन एक करने से आहार बिहार की अनियमितता के कारण बढ़ते स्वास्थ्य को जबरदस्त धक्का लगा बैठा, जो खाए, पोए, वही बाहर।


रोग और सहनशीलता

अन्त में खून की उलटियां प्रारम्भ हो गईं। गुदा से रक्तमिश्रित मल भी आने लगा था एवं नाक से भी रुधिर निकलना आरम्भ हो गया था। खाना, पीना बन्द हो जाने और रुधिर के अनेक मार्गों से लगातार निकलते रहने पर शरीर अस्थिपंजर रह गया था, फिर भी स्मृति बराबर बनी हुई थी।

सहिष्णु इतने थे कि अन्त काल तक आंसू की एक बूंद भी देखने में नहीं आई। हम सब का प्रयास था कि वे कम से कम बोलें, पर आवश्यकता जानने पर वे अपनी रुग्णता व औषधोपचार का क्रमशः सांगोपांग वर्णन वाचातथ्य चिरकाल तक करते थे।


व्याख्यान कला और स्मरण शक्ति

उनके कथोपकथन से बल्कि हमें ही स्मृति लौटती थी। एक कुशल व्याख्याता के अनिवार्य गुण उनमें विद्यमान थे। मृत्यु से केवल दो दिन पूर्व हो श्री वेद्य ओम्प्रकाश जी को अपनी बात बताते हुए यह चमत्कार उन्होंने दिखाया।इस प्रतिभाशाली युवा की प्रवृत्ति चहुँ ओर दोल पड़ती थी।


गुरुकुल जीवन

२९-७-१९५९ को गुरुकुल झज्जर में प्रविष्ट होने के पश्चात् से ब्रह्मचारी सत्यव्रत ने निर्धारित दिनचर्या के आधार पर आठ वर्ष के अध्ययनकाल में अपने जीवन में वह उल्लास देखा, जिसकी उन्हें कल्पना भी न थी।

इस अपनी अनुभूति का लाभ दीन-दुःखियों को भी मिल सके, इस लोक-हितकारी युवक ने २१ वर्ष की अल्प आयु में ही “एक सत्पुरुष की दिनचर्या (दैनन्दिनी)” नामक पुस्तक लिखकर अगणित बालकों, युवकों, इच्छुकों, नर-नारियों को जीवनोन्नति का मार्ग दिखाया।


साहित्यिक योगदान

हरयाणा राज्य के भाषा विभाग ने इस पुस्तक को छात्रों के बहुत उपयोगी समझा, और स्कूलों के पुस्तकालयार्थ स्वीकार कर लिया। इसके बाद “सुलो जीवन” नामक दूसरी कृत्ति जनता को भेंट की।

इसका भी हरयाणा राज्य के भाषा विभाग ने मूल्यांकन किया और १९७१-७२ वर्ष में बाल साहित्य के अन्तर्गत इसे पुरस्कृत किया। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि छोटी आयु में जिसने ऐसी रचना कर डाली, वह युवक कितना योग्य होगा।

जनता की मांग इतनी अधिक है कि अनेक संस्करण इन पुस्तकों के निकल चुके हैं। रुग्ण होने से पूर्व तीसरी रचना “महापुरुषों के संग में” और भी जनता के सम्मुख प्रस्तुत कर दी थी। इस प्रकार तीन वर्षों में जोवनोत्थान का वह साहित्य प्रदान किया, जिसको देखकर इस युवक की स्मृति निरन्तर बनी रहती है।


व्यक्तित्व और आकर्षण

इनका लम्बा कद, विशाल ललाट, गौर वर्ण, सुगठित शरीर, दीप्तिमान् चेहरा बरबस ही समवयस्कों को आकर्षित करता था। देखने में आया है कि इनके अनुयायी बढ़ रहे थे और भावी जीवन की एक रूपरेखा बना रहे थे।स्थान-स्थान पर गुरुकुलों के खोलने का उद्देश्य तो था ही, स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों में जा-जा कर भी नई पीढ़ियों को उठाने की एक बड़ी योजना थी।


अन्तिम समय और वचन

मार्गशीर्ष शुक्ला ३ संवत् २०३१ विक्रमी (१६-१२-१९७४ ई०) के प्रातः ७ बजकर ५० मिनट पर शरीर छोड़ते हुए अपने साथियों से गम्भीरतापूर्वक ये वचन बोले:
“सारी योजनायें विफल हो गईं, आप सब मिलकर रहना।”


वैदिक धर्म के प्रति समर्पण

हुतात्मा श्री सत्यव्रत ‘अग्निवेश’ ने अपना जीवन वैदिक धर्म के प्रचार हेतु समर्पित कर दिया था। हम सब के द्वारा प्रेरित किये जाने पर भी अपनी रुग्णता की सूचना अपने घर वालों को नहीं देने दी।

भावी जीवन में बड़े बनने वालों के यही लक्षण होते हैं। वे सगे सम्बन्धियों के मोहपाश से एकदम उन्मुक्त हो जाया करते हैं।


गुरुदेव के प्रति श्रद्धा

वे अपने जीवन के निर्माता श्री ओ३मानन्द जी सरस्वती (आचार्य भगवान्देव जी) को पूज्य गुरुदेव के रूप में हृदय में स्थान दिए रहते थे और गुरुदेव आचार्यप्रवर का जहां कहीं से भी कोई चित्र, प्रतिकृति मिल जाती थी, बड़ों श्रद्धा से उसे ग्रन्थों में रक्खा करते थे।


गुरुकुल परिवार की सेवा भावना

आन्तरिक भाव आन्तरिक भावों को पहचानते हैं, इस आत्मीयता में गुरुदेव ने भी इस लाल की जोवनलीला विलीन न होने देने की भरसक कोशिश की, पर विधाता के सामने चारा न चलने से बचा न सके।गुरुकुल के सारे प्राध्यापक, कर्मचारी सेवा में इतने तत्पर रहे कि वह बुद्धि से सदा जागरूक प्राणो भीतर ही भीतर इसे अनुभव कर रहा था।


अन्तिम लेख

१२-१२-१९७४ के प्रातः चार बजे जब श्री गुरुदेव स्वामी ओ३मानन्द जी सरस्वती और श्री स्वामी वेदानन्द वेदवागीश उनकी सेवा में बैठे थे, तब उन्होंने एक कागज मांगा और उस पर लिखने को कहा, लिखा:
“भगवान् को साक्षी करके मैं यह पूर्ण विश्वास से कहता हूँ कि प्रेम के होते हुए भी (सब कुछ होते हुए भी) मैं खत्म हो जाऊँगा”
और इस कागज को सन्दूक में रखने के लिये कह दिया। इन पंक्तियों के लेखक ने उनकी इस बात का ऐसे ही पालन किया।


अन्त्येष्टि संस्कार

अन्त्येष्टि संस्कार पर ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था, जिसका गला उस प्रेमी के चले जाने से रुध न गया हो, कोई ऐसा हृदय नहीं था, जिसने दाह संस्कार में कुछ न कुछ अर्पित न किया हो।

परिणामस्वरूप उनके शरीर को भस्म करने के लिये ७० किलो घृत, मन सामग्री, चन्दन और कपूर चुपचाप अवसाद के वातावरण में इकट्ठा हो गया।

निरन्तर घृत की पुष्कल आहुतियां चिता में पड़ने से बादल उमड़ आये। भारी वर्षा हुई और सूखती हुई खेती में जान आ गई। यह वर्षा गुरुकुल के तीन बार मोल के क्षेत्र में ही हुई।

बहुतों के मुख से ये शब्द सुनने को मिले –
“बड़ा शुभकर्मी बालक था, जाता जाता भी कल्याण कर गया।”


जन्म और नामकरण

हरयाणा की दादरी तहसील के अन्तर्गत शोभूकर्ता ग्राम में श्री धनसिंह पिता और पतोरी माता के यहां यह बालक १९४७ में जन्मा था।
घर का नाम गणपत था।

गुरुकुल झज्जर में प्रवेश किये जाने पर सत्यव्रत नाम रखा गया और विद्याध्ययन समाप्ति पर श्री सत्यव्रत जी ने स्वयं ही प्राचीन ग्रन्थों से ‘अग्निवेश’ शब्द निकालकर अपने नाम के अन्त में लगाना आरम्भ कर दिया था।


अध्ययन और अध्यापन

गुरुकुल के अध्ययनकाल में इस प्रतिभासम्पन्न ब्रह्मचारी ने सैद्धान्तिक सम्पूर्ण ग्रन्थ, संस्कृत साहित्य, व्याकरण, निरुक्त और सम्पूर्ण यजुर्वेद अर्थ सहित पढ़ लिया था।

अध्यापन शैली बड़ी रोचक थी। पढ़ाने से पूर्व पाठ को विचार कर जाते थे।
“मेरी विद्या विद्यार्थियों के अन्तःकरण में प्रविष्ट हो जाये” — ऐसा पूर्ण प्रयास करते थे।

पढ़ाने की सरल वैज्ञानिक प्रक्रिया में विलक्षण थे। छात्रों को दण्ड किसी भयंकर भूल पर ही देते थे। आंख दिखाना ही पर्याप्त था। उनकी गम्भीरता में बहुत कुछ नेतृत्व के गुण छिपे थे।


प्रबन्ध कुशलता

प्रबन्ध कुशलता प्रायः अनेक वर्षों में लोगों को आती है, पर श्री सत्यव्रत अग्निवेश प्रबन्ध में ऐसे निष्णात देखे गये, मानो जन्म से ही सीखकर आये हों।

आचार्यश्रेष्ठ ने गुरुकुल का संचालन उन्हीं को सौंप रक्खा था। अतः गुरुकुल को उन्नति में लगातार चेष्टावान् बने रहे।

पहली चली आई प्रवन्ध व्यवस्था में अनेक सुधार किये। गुरुकुल की एक पैसे की हानि भी उन्हें बखरती थी। इसकी अभिवृद्धि में ही आगे आगे पग बढ़ाये।

सरकार से ट्रॅक्टर लेने में उनका बहुत बड़ा प्रयत्न था, जिसमें सफल भी हुए। धन वृद्धि के लिए एक औषधालय की स्थापना की, जो अब उन्हीं के नाम से चल रहा है।


ब्रह्मचर्य और त्याग

गार्हस्थ्य जीवन की भावना के लिए अन्तस्थल में किचिन्मात्र भी स्थान न था। त्याग का उद्रेक इतना था कि भगवा वस्त्रधारण उनके मन को बहुत भाता था।

साधुओं के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। स्वयं भी श्वेत वस्त्रों में साधु जीवन बना रक्खा था। कमण्डलु भी सन्तों जैसा ले लिया था।

सिला हुआ कुर्ता आदि पहनना रुग्णावस्था में भी पसन्द नहीं किया। आजीवन ब्रह्मचारी रहने का व्रत ले लिया था। कई अपने साथियों को भी दिलाया था।

एक बार संन्यास की दीक्षा लेकर गेरुवे वस्त्र पहनने का विचार कर लिया था, पर इन पंक्तियों के लेखक ने कच्ची उमर जान, निषेध कर दिया था। कुछ वर्ष इसी वेश में व्यतीत करने की प्रेरणा पाकर वे मान गये थे।


आर्य समाज की क्षति

“मोठी रोटी जिधर से खाओ, उधर से हो मोठी लगती है,”
ऐसे थे श्री सत्यव्रत ‘अग्निवेश’।

आर्यसमाज से सचमुच एक भावी तारा छिन गया।