श्री रतिराम जी

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🧬 परिवार और प्रारंभिक जीवन

श्री रतिराम जी का जन्म ग्राम सांपला, जिला रोहतक (हरियाणा) में श्रीमती छोटी देवी की कोख से हुआ। उनके पिता का नाम श्री मुसद्दीलाल जी था।
अग्रवाल जाति के थे। चार भाइयों में ये एक थे – कृष्ण, अर्जुनलाल, छोटूराम, और शान्तिप्रसाद।बचपन में पशु चराने का कार्य किया, और शिक्षा पाँचवीं कक्षा तक प्राप्त की। यद्यपि पढ़ाई सीमित थी, परंतु विचार बहुत ऊँचे थे। बचपन से ही भक्तस्वभाव और सेवा भावना उनके जीवन का हिस्सा बन गई थी।


🏳 राष्ट्रसेवा और जेल यात्रा

वे आर्य समाज एवं कांग्रेस को अपने प्राणों से प्रिय समझते थे।1930 के सविनय आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया।इन्हें 9 माह की जेल सजा हुई। पुलिस अत्याचारों के बावजूद उन्होंने कर्तव्य-पथ नहीं छोड़ा। उन्होंने कभी कठोर शब्द नहीं कहे, बल्कि शांतिपूर्वक सहनशीलता का उदाहरण प्रस्तुत किया।


🔥 साम्प्रदायिक अफवाहों के विरुद्ध सजग प्रहरी

जब क्षेत्र में यह अफवाह फैली कि “मुसलमान हिन्दू बच्चों को उठा ले जाते हैं”, तो श्री रतिराम जी ने गाँव-गाँव जाकर लोगों को सावधान और सतर्क किया। उन्होंने भूख, प्यास, गर्मी की परवाह किए बिना अपराधियों को खोजने का प्रयास किया।


✊ हैदराबाद सत्याग्रह में भागीदारी

जब हैदराबाद सत्याग्रह का आह्वान हुआ तो वे सतत सत्याग्रही बनकर सम्मिलित हुए।
जेल से जब वे अत्यंत रुग्ण अवस्था में छूटे, तो सांपला लौटे और वहीं 25 अगस्त 1939 को लगभग 32-33 वर्ष की आयु में उनका शरीरांत हुआ।


💧 सेवा, त्याग और आत्मशुद्धि का प्रतीक

गर्मियों में प्याऊ लगवाना और दूसरों को इसके लिए प्रेरित करना

1.हरिजनोद्धार में योगदान

2.अतिथि सत्कार में श्रद्धा

3.कुटुम्बियों की बजाय समस्त समाज से प्रेम

विवाह न करने का संकल्प — उनका मानना था कि “जाति सेवा में विवाह सबसे बड़ी रुकावट है।”


🌺 अंतिम श्रद्धांजलि

श्री रतिराम जी का संपूर्ण जीवन निःस्वार्थ सेवा, धर्मनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। उन्होंने धर्म और मानवता की वेदी पर अपने प्राण अर्पण कर दिए।