श्री खण्डेराव गणपतराव जगताप

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✦ प्रस्तावना

“अनुभवति हि मूर्ध्वा पादपस्तीवमुष्ां, शमयति परितापं छायया संचितानाम्।।
सच्चिदानन्दस्वरूप स्वयम्भूः परमेश्वर की इस दिव्य सुष्टि में विविध प्रकार की विचित्रतायों का समावेश है। यहाँ सुख-दुःख, जन्म-मरण, हर्ष-विषाद, लाभ-हानि, सफलता-असफलता, जय-पराजय, जीवन-मरण, हँसी-रोना, चहल-पहल और सूनापन- सभी कुछ है। इस संसार का सृजन, संचालन और संहार करनेवाला वही परमात्मा है, जो हमें अपने कर्मो का फल देता है। अपने जन्म के साथ ही हमारी मृत्यु भी सुनिश्चित हो जाती है। संसार का प्रत्येक प्राणी यह जानता है कि मृत्यु अटल है और वह कभी भी किसी को भी अपने पाश में बाँध सकती है।


✦ जीवन की क्षणभंगुरता और परोपकार

अपने जीवन की इस क्षणभंगुरता को जानकर जो व्यक्ति निज स्वार्थ के लिए जीता है, वह कदापि स्मरणीय नहीं बन सकता; अपितु वे ही प्रशंसनीय हैं जो दूसरों के लिए जीते हैं। ‘परोपकाराय सतां विभूतयः’ इस सूक्ति को अपनाकर जो लोग परोपकार में, आत्मोत्थान में, राष्ट्रोत्थान में, जाति के उद्धार में, शील, चरित्र, आत्मबल, आत्मज्ञान के प्रचार में तथा शोषित, पीड़ित, अपमानित और अंधकार में भटकती हुई मानवता को प्रकाश देने में अपने प्राणों को उत्सर्ग करते हैं, उनका जीवन और बलिदान मानव जाति के लिए सदैव एक अमर सन्देश बनकर मार्गदर्शन करता है।


✦ आर्य वीर का जन्म

ऐसे ही एक वैदिक वीर, महान आर्यभक्त, आर्य समाज के जुझारू कार्यकर्ता, हंसोट के आर्य समाज के संस्थापक सदस्य और हंसोट-भरुच के आर्य प्रतिनिधि के रूप में विख्यात तथा आर्य वीर दल के संस्थापक सदस्यों में से एक, सहर्ष बलिदान देनेवाले क्रान्तिकारी वीर श्री खण्डेराव गणपतराव जगताप का जन्म गुजरात के भरुच जिले के नरसापुर गाँव में हुआ था। आपने अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राथमिक पाठशाला नरसापुर से ही प्राप्त की।


✦ वैदिक शिक्षा और समाजसेवा की ओर रुझान

बाल्यकाल से ही आपका झुकाव आर्य समाज की वैदिक विचारधारा की ओर था। फलस्वरूप शिक्षा के साथ-साथ आपने आर्य समाज के सिद्धांतों का गहन अध्ययन किया। अपने क्षेत्र में वैदिक सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार के लिए आपने कोई कसर नहीं छोड़ी।


✦ आर्य समाज में सक्रियता

आप जब कक्षा ५ के छात्र थे, तभी आपने आर्य समाज का सम्पर्क किया और नियमित रूप से सत्संग, यज्ञ, वैदिक वांग्मय के पाठ और प्रचार में भाग लेने लगे। धीरे-धीरे आपकी प्रवृत्ति सामाजिक कार्यों की ओर बढ़ती गई और आप सक्रिय रूप से आर्य समाज के विविध कार्यक्रमों में सम्मिलित होने लगे।


✦ शिक्षक से समाज सुधारक तक

आप एक शिक्षक थे, परन्तु शिक्षक होने के साथ-साथ आप एक यशस्वी समाज सुधारक, कुशल आयोजक और आत्मत्यागी क्रांतिकारी भी थे। आप छात्रों में नैतिक और वैदिक शिक्षा का प्रचार करते हुए उनमें देशप्रेम और चरित्रबल का संचार करते थे। आपने शिक्षण को केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं माना, अपितु आपने उसे समाजोत्थान का माध्यम बना दिया।


✦ संगठन निर्माण और सेवा कार्य

आपने भरुच आर्य समाज के मंत्री पद को बड़ी निष्ठा से निभाया। समाज के आयोजन, शुद्धि आंदोलन, सामाजिक कार्यों में आप सदा अग्रणी रहे। आपने कन्या पाठशालाओं, यज्ञशालाओं, गौशालाओं और आर्य बालकों के लिए विद्यालयों की स्थापना की। सच्चे सेवक की भाँति आप निःस्वार्थ भाव से जनसेवा करते थे।


✦ मूर्तिपूजा और कट्टरपंथ के विरुद्ध

सन् १९२६ में आपने हंसोट गाँव में मूर्तिभंग का आयोजन किया, जिससे क्षेत्र के मूर्तिपूजकों और कट्टरपंथियों में खलबली मच गई। विरोध और धमकियों के बावजूद आपने कोई विचलन नहीं दिखाया और आर्य समाज की नीति पर अडिग रहे।


✦ श्रद्धानन्द बलिदान और हिंदू जागरण

महात्मा स्वामी श्रद्धानन्द जी की बलिदान-घटना ने आपको अत्यंत व्यथित कर दिया। आपने इस प्रसंग पर क्षेत्र में सभा आयोजित की, जिसमें श्रद्धांजलि स्वरूप एकजुट होकर वैदिक धर्म की रक्षा का संकल्प लिया गया।


✦ शिवाजी जयंती और हिंदू सभा

आपने शिवाजी जयंती जैसे आयोजनों के माध्यम से हिंदू समाज में वीरता, संगठन और स्वाभिमान की भावना को जागृत किया। आप हिंदू सभा से भी जुड़े और उसमें कार्यरत रहे।


✦ स्त्री सम्मान और विधवा उद्धार

आप स्त्रियों के उत्थान में विशेष रुचि रखते थे। आपने विधवाओं के पुनर्विवाह और सम्मान की दिशा में कार्य किया और बालविवाह, दहेज जैसी कुप्रथाओं का विरोध किया।


✦ अछूत उद्धार और शुद्धि आंदोलन

आपका शुद्धि कार्य इतना प्रभावशाली था कि आपने मुसलमान और ईसाई बने अनेक व्यक्तियों को पुनः वैदिक धर्म में दीक्षित किया। आपके इस कार्य से समाज में चेतना जागी, लेकिन कट्टरपंथियों में असहिष्णुता भी बढ़ी।


✦ वैयक्तिक सिद्धांत

आप किसी राजनैतिक दल के अनुयायी नहीं थे। आप केवल एक वैदिक धर्मसेवक थे। आपने सत्य, धर्म और मानवता के पक्ष में रहते हुए जीवनभर कार्य किया। आपको सरकार से कोई लाभ नहीं चाहिए था, न आपने कभी लिया।


✦ बलिदान की भूमिका

आपके पिता गणपतराव जगताप ने आपको एक बार कहा, “अब बहुत सेवा हो गई, अब आराम कर।” इस पर आपका उत्तर था—
“जब तक यह शरीर है, तब तक यह राष्ट्र और धर्म के लिए ही काम आएगा।”


✦ 5 मार्च 1930 – शहादत का दिन

५ मार्च १९३० को जब आप अपने गांव लौट रहे थे, एक बालक गोपाल पर कुछ मुसलमानों ने आक्रमण कर दिया। आपने उस बालक की रक्षा की, लेकिन उसके बाद आपका पीछा किया गया और निर्ममता से हत्या कर दी गई। आप वीरगति को प्राप्त हुए।


✦ श्रद्धांजलि

आपकी मृत्यु पर हजारों लोगों ने आपके अन्तिम संस्कार में भाग लिया। लोगों ने सरकार से दोषियों को दंड देने की माँग की, परंतु प्रशासन मौन रहा।