वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्यमार्ग पर डट जावें।
परसेवा पर-उपकार को कर निज जीवन सफल बना जावें।।
जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन
श्री जयराम जी ब्राह्मण स्वर्णकार थे। उनका जन्म चैत्र कृष्णा १४, संवत् १९४६ को कच्छ मौरवी में हुआ। पाँच वर्ष की आयु में पितृस्नेह से वंचित होने के बाद, वे अपनी माता के साथ जोधपुर आ गये। यहीं बड़े हुए और कार्य सीखा। तत्पश्चात उन्होंने अपनी निजी दुकान खोली, जिसे वे पूरी ईमानदारी से चलाते थे, जिसके कारण व्यापार खूब फला-फूला।
आर्य समाज से जुड़ाव
कार्यवश एक वर्ष के लिए करांची गए, जहाँ उन्होंने आर्य समाज का उत्सव देखा। इससे प्रेरित होकर जोधपुर लौटने के बाद वे आर्य समाज के सदस्य बन गये और कुछ वर्षों बाद अन्तरंग सदस्य भी चुने गये।
उनका जीवन अत्यंत नियमित था—
प्रतिदिन प्रातः ४ बजे उठकर प्रभु-प्रार्थना एवं भ्रमण।स्नान के बाद संध्योपासना और आजीविका में प्रवृत्ति।प्रत्येक अमावस्या को घर पर हवन।उनके प्रभाव से मोहल्ले के कई युवक आर्य समाजी बने।
हैदराबाद सत्याग्रह के प्रति उत्साह
जब हैदराबाद का सत्याग्रह प्रारम्भ हुआ, तब वे अक्सर कहा करते—
“नम्बर आने पर मैं भी सत्याग्रह में अवश्य जाऊँगा।”
जोधपुर में उम्मेद कन्या पाठशाला (सोजती गेट) में सत्याग्रह संबंधी सभाओं में वे नियमित रूप से सम्मिलित होते थे।
वीरगति की घटना
२९ मई १९३९ को बम्बई सरकार द्वारा सत्याग्रह शिविर हटाने के विरोध में कन्या पाठशाला में विराट सभा आयोजित हुई। सभा के बाद घर लौटते समय उन्हें पता चला कि उनके मुहल्ले में हिन्दू युवकों और मुसलमानों के बीच झगड़ा हो गया है।वे तुरंत वहाँ पहुँचे और युवकों को लेकर आगे बढ़े, परंतु पीछे से मुसलमानों ने हमला कर दिया। प्रारंभ में उन्होंने साहसपूर्वक सामना किया, लेकिन लाठी टूट जाने पर हमलावरों ने सिर पर प्रहार कर उन्हें घायल कर दिया।उन्हें रात में अस्पताल पहुँचाया गया, परंतु ३० मई १९३९ (ज्येष्ठ शुक्ला १२, संवत् १९९५) को उनका देहावसान हो गया।
अंतिम संस्कार
उनके निधन के बाद हजारों लोग एकत्रित हुए। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ उनकी अर्थी सजाई गई और वैदिक विधि से उनका अंतिम संस्कार किया गया।
व्यक्तित्व एवं विरासत
श्री जयराम जी का जीवन निर्भयता, धर्मप्रेम और परोपकार का अद्वितीय उदाहरण है। उनका बलिदान आर्य समाज और समाज सुधार की दिशा में प्रेरणा देता है।










