“धर्मस्य गहना गतिः”
शहीद श्री भैरोसिंह जी राजस्थान के बाँदीकुई (जयपुर) के समीप स्थित पाखर ग्राम के निवासी थे। उनके पिता का नाम श्री हरभजन जी था। जन्म से वे “बलाई” जाति से संबंध रखते थे। उनके पिता आबूरोड में बी.बी. एंड सी.आई.आर. के इंजीनियरिंग विभाग में हेड मेट के पद पर कार्यरत थे, जिनकी सिफारिश पर भैरोसिंह जी को भी रेलवे विभाग में नौकरी मिली।
वे पर्मानेंट वे इंस्पेक्टर के अंतर्गत कार्यरत पेंटिंग विभाग में सेवा कर रहे थे। आर्य समाज के सक्रिय सदस्य होने के साथ-साथ वे सामाजिक सेवा तथा भजनों के प्रति अत्यंत रुचि रखते थे। धर्म, समाज और सत्य के लिए उनके भीतर अगाध निष्ठा थी।
उनके क्वार्टर की लाइन में एक अब्दुलरशीद नामक मुस्लिम व्यक्ति भी रहता था, जो रेलवे के सुपरवाइजर विभाग में कार्य करता था। अब्दुलरशीद को भैरोसिंह जी का आर्यसमाजी होना असहनीय था। कई बार वाद-विवाद की स्थितियाँ बनती थीं।
संभवत: यह सन् 1934 की बात है — एक दिन सायंकाल बंदूक की आवाज़ सुनाई दी। लोग दौड़े तो देखा कि भैरोसिंह जी रक्तरंजित अवस्था में भूमि पर पड़े हैं और अब्दुलरशीद अपने क्वार्टर के सामने बंदूक लिए खड़ा है। तत्काल पुलिस को सूचना दी गई, और भैरोसिंह जी को रेलवे अस्पताल पहुँचाया गया।
छर्रे निकालते समय ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। उस समय उनकी आयु मात्र 27 वर्ष थी। उनका बलिदान अकारण था, किंतु एक आर्य समाजी के रूप में जीना ही शायद उनके अपराध के रूप में देखा गया।
हत्यारे अब्दुलरशीद को 20 वर्ष का सश्रम कारावास दिया गया, परंतु उसने गोली चलाने का कोई स्पष्ट कारण कभी नहीं बताया।
श्री भैरोसिंह जी के पिता का निधन उनके बलिदान से पूर्व ही हो चुका था। उनके परिवार में तब केवल उनकी माता एवं एक बहन शेष रह गई थीं।










