श्रद्धा का रहस्य

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व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् ।

दक्षिणा श्रद्धा माप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते

॥ यः १६/३०

दृष्ट्वा रूपे व्यकरोत् सत्यानृते प्रजापतिः ।

श्रद्धामनृतेऽदधाच्छ्रद्धां सत्ये प्रजापतिः

॥ यः १६/७७

तर्जः पतिदेव पुजिते (गंगा वनात)

हम अपने व्रत के द्वारा पाते हैं योग्यता
इस योग्यता से आदर, आदर से सत्यता ॥

श्रद्धा से युक्त होकर करना है सत्यधारण
श्रद्धा ही मानवों की बने सत्य का ही कारण
और सत्य से ही आत्मा में जागती प्रभा॥
इस योग्यता से….

है प्रमाणों से परीक्षित श्रद्धा से सत्य संवृद्ध
अनृत में स्थित अश्रद्धा जो प्रत्यक्षप्रमाण विरुद्ध
सच्चा श्रद्धालु केवल सत्य व्रत में शोभता॥
इस योग्यता से…

इक सत्य इक असत्य लक्षण पृथक् पृथक हैं
इक सृष्टि नियम के संग दूजा नियम विमुख है
सत्याचरण से पाते उत्साह प्रथमतः ॥
इस योग्यता से…

लज्जा संकोच भय है असत्य आचरण में
आत्मा बनाते पापी जाते अधःपतन में
खो देते हैं जीवन का उत्साह सर्वथा।
इस योग्यता से…

श्रद्धा से सत्य जागे, मन से कुटिलता भागे
जीवन को करके उन्नत, बढ़ जायें आगे आगे
जानो वो सत्य श्रद्धा, ईश्वर जो धारता ॥
इस योग्यता से…

(परीक्षित) परखा हुआ। (प्रभा) तेज, कांति। (संवृद्ध) उन्नत, बढ़ा हुआ। (प्रत्यक्ष प्रमाण)
सत्य प्रमाणों से सिद्ध। (कुटिलता) टेढ़ापन, छल। (प्रथमतः) सबसे पहले।