श्रद्धा का रहस्य

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यया॑ दे॒वा असुरेषु श्रृद्धा मुग्रेषु चक्रिरे।

एवं भोजेषु यज्वस्वस्भाक॑मुद्रितं कृधि ॥

ऋ. १०.१५१.३

तर्जः जन पळ भर म्हणतिल हाय हाय

श्रद्धा बल करता दिव्य काज
जो भय का कर देता विनाश
॥ श्रद्धा बल ॥

देश धर्म जाति का गौरव
श्रद्धा ही मन में उपजाये
श्रद्धालु बलिदानी बनके (2)
अभय होके करते प्राणत्याग (2)
॥ जो भय का॥

ऐसे तेजस्वी तो होते
विद्वानों के श्रद्धा-भाजन
जागरुक सद्भाव में रहते (2)
बनें आदर सत्कार के पात्र (2)
॥जो भय का॥

भूखों को भरपेट भोजन दे
नंगों को आच्छादित कर दे
श्रद्धा प्रीति से दे सत्कार (2)
अभ्युदय से वो पायें प्रकाश (2)
॥ जो भय का॥

(श्रद्धा भाजन) श्रद्धा के आधार (आच्छादित) ढक देना। (अभ्युदय) उन्नति, मनोरथ की सिद्धि।