प्रियं श्रद्धे दद॑तः प्रियं श्रद्धे दिदासतः ।
प्रियं भोजेषु यज्व॑स्व॒दं म॑ उदितं कृधि।
ऋ. १०.१५१.२
तर्जः भक्तिच्या फुलांची डोलातो सुवास
श्रद्धावान दानी भलाई का पात्र
श्रद्धा का ये धन भी निर्धन के पास
॥ श्रद्धावान॥
यज्ञ करें तो होवे लोकोपकार (2)
पर-क्षुधा हरें, ये भी श्रद्धा का प्रकार।
सफल दान वो, जिसमें श्रद्धा अधिमात्र।
॥ श्रद्धावान॥
श्रद्धावान याज्ञिक बढ़ाते हैं सुयश (2)
अभ्युदय होता जीवन का आदर्श
सत्प्रयत्न ही सफलता का विपाक
॥ श्रद्धावान॥
हे श्रद्धे ! भला कर सब दानियों का (2)
सर्व याज्ञिकों का सर्व ज्ञानियों का
उदित रहे अग्निरूप यज्ञमय प्रकाश
॥ श्रद्धावान॥
(अधिमात्र) अधिक प्रमाण का। (विपाक) परिणाम, कर्म का फल।










