जन्म एवं परिचय
भटगांव, जिला सोनीपत (हरियाणा) में दहिया गोत्र के जाट क्षत्रिय कुल में वीर चौ० शेर सिंह शेर जी का जन्म हुआ। आप स्वभाव से दबंग, निर्भीक एवं आर्यवीर थे। आर्य समाज के कार्यों में सदैव अग्रणी रहते थे और समाज सुधार के हर आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे।
स्वभाव और कार्यशैली
आपका स्वभाव अत्यंत स्पष्टवादी और निडर था। विधर्मी गुण्डे यदि कोई गड़बड़ी करते तो उन्हें दण्ड देने और डटकर सामना करने में कभी संकोच नहीं करते थे। दहिया जाटों के मान्यताप्राप्त चौधरी होने के नाते आपका प्रभाव क्षेत्र व्यापक था। आर्य समाज के कार्यों में आपकी सक्रियता और निष्ठा से समाज के शत्रु ईर्ष्या और भय से भर उठते थे।
षड्यंत्र और शहादत
आर्य समाज के बढ़ते प्रभाव को देखकर विधर्मी तत्वों ने एक षड्यंत्र रचा। पहले से ही यह योजना बनाई गई थी कि आर्य समाज के प्रमुख कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा जाएगा। इसी योजना के अंतर्गत सांची गाँव का कुख्यात दस नम्बर का गुण्डा मुगला, जो एक डाकू और आर्य समाज का कट्टर शत्रु था, ने अवसर पाकर चौ० शेर सिंह शेर जी पर गोली चला दी। वीर चौ० शेर सिंह शेर वीरगति को प्राप्त हुए।
बलिदान और यश
उनकी शहादत ने आर्य समाज के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी। हरियाणा का जन-जन आज भी श्रद्धा और गर्व से उन्हें स्मरण करता है। उनका शरीर भले ही इस संसार में नहीं रहा, परन्तु उनका यशःशरीर समाज की स्मृतियों और जनमानस के हृदयों में सदैव जीवित रहेगा।
संदेश और आदर्श
शेर सिंह शेर जी का जीवन और बलिदान यह सिखाता है कि –
“परोपकाराय सतां विभूतयः” – सत्पुरुषों का सम्पूर्ण जीवन परोपकार के लिए ही होता है।
उन्होंने अपने जीवन को समाज-सेवा में समर्पित किया। सत्य और धर्म की रक्षा हेतु शत्रुओं से टकराना ही उनका जीवन-मंत्र था।
निष्कर्ष
धर्म के लिए प्राणों का बलिदान देने वाले शहीद चौ० शेर सिंह शेर जी सचमुच शेर्रासह शेर थे। वे आज भी आर्य समाज और हरियाणा की धरती पर बलिदान के प्रतीक, वीरता के आदर्श और प्रेरणा के स्रोत हैं।










