शान्ति कीजिए प्रभु त्रिभुवन में
शान्ति कीजिए प्रभु त्रिभुवन में ।। टेक ।।
२ बार……
जल में थल में और गगन में,
अन्तरिक्ष में अग्नि पवन में।
औषधी वनस्पति वन उपवन में,
सकल विश्व के जड़ चेतन में।
शान्ति…….
ब्राह्मण के उपदेश वचन में,
क्षत्रिय के द्वारा हो रण में।
वैश्य जनों के होवे धन में,
और श्रमिक के हो चरणन में।।
शान्ति …….
शान्ति राष्ट्र निर्माण सृजन में,
नगर ग्राम में और भवन में।
जीव मात्र के तन मन में,
और प्रकृति के हो कण-कण में।।
शान्ति ….










