पृष्ठभूमि
पंजाब में हिन्दी की रक्षा के लिए जब सत्याग्रह का बिगुल बजा, तब हरियाणे के वीर जत्थों में संगठित होकर चंडीगढ़ की ओर चल पड़े। सात मास तक चले इस संघर्ष में आर्य समाज के वीरों ने सरकार को झकझोर कर रख दिया। अंततः उनके बलिदान रंग लाए और सरकार को झुकना पड़ा।
रेल दुर्घटना और शहादत
विजय की दुंदुभि बजाने के बाद हजारों आर्यवीर जेलों से रिहा होकर अपने घर लौटने लगे। अम्बाला से दिल्ली लौटती एक रेलगाड़ी में भी सैकड़ों सत्याग्रही सवार थे। मोड़ी स्टेशन पर इस रेलगाड़ी की दुर्घटना हो गई, जिसमें अनेक वीर घायल हुए और दर्जनों शहीद हो गए। उन्हीं शहीदों में दो वीर युवक – अमरसिंह और सुवर्णसिंह – भी थे।
व्यक्तिगत परिचय
ये दोनों जींद जिले के गुलकणी और राजपुरा बहन के जाट क्षत्रिय परिवारों में जन्मे थे। स्वस्थ, सुदृढ़, सदाचारी और धार्मिक गृहस्थ युवक थे। आर्य समाज के गहरे रंग में रंगे हुए, वैदिक जीवन को आचरण में लाने वाले सच्चे आर्य थे।
स्मारक निर्माण
उनके बलिदान के बाद जींद और हरियाणा की जनता ने उनका स्मारक बनाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। पञ्चायत ने भूमि दान में दी। जनसाधारण ने जी खोलकर धन दिया। दोनों परिवारों ने भी तन-मन-धन से सहयोग किया। परिणामस्वरूप गुलकणी और राजपुरा बहन में भव्य आर्य समाज मंदिर का निर्माण हुआ, जो उनकी शहादत का सजीव स्मारक है।
स्मृति एवं प्रेरणा
प्रतिवर्ष यहाँ बलिदान दिवस पर उत्सव आयोजित होता है और धार्मिक मेला लगता है। इस स्मारक पर व्यायामशाला और अखाड़ा भी है, जहाँ युवक कुश्ती और व्यायाम करते हैं। ब्रह्मचारी कर्मपाल जी यहाँ औषधालय चलाकर हज़ारों रोगियों की सेवा करते हैं। आचार्य देवव्रत जी ब्रह्मचर्य शिविर लगाकर युवकों को व्यायाम और शारीरिक शिक्षा के लिए तैयार करते हैं। उनके प्रयासों से स्मारक सेवा-कार्य का केंद्र बन गया है और आसपास के क्षेत्र में आर्य समाज का प्रचार-प्रसार भी तेजी से हुआ है।
निष्कर्ष
अमरसिंह और सुवर्णसिंह की शहादत ने न केवल हिन्दी की रक्षा के आंदोलन को अमर कर दिया, बल्कि सेवा और धर्मप्रचार का भी मार्ग प्रशस्त कर दिया। उनकी स्मृति में गाए जाने वाले गीत आज भी युवाओं में जोश भरते हैं—
“शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर वर्ष मेले,
धर्म पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।”










