विद्यासागर जी

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शहीद आर्य वीर विद्यासागर जी का जीवन-परिचय
(एक त्यागी, समाजसेवी और बलिदानी योद्धा का प्रेरणादायक जीवन)


  1. परिचय एवं जन्म

विद्यासागर जी का जन्म पौष शुक्ल २७, संवत् १९७५ विक्रमी को जिला झेलम (अब पाकिस्तान में) के मौजा सलोई नामक ग्राम में हुआ। यह जन्म एक मुसलमान विधवा के मकान में हुआ था, जहाँ उस समय उनकी माता निवास कर रही थीं। बचपन में ही एक मुस्लिम वृद्धा ने उनके मुँह में सखाँड (शक्कर) दी और उनकी मासी ने शहद से उनकी जीभ पर “ॐ” लिखा। यह बालक भाग्यशाली था—कई बार जीवन के संकटों से बाल-बाल बचा।


  1. पारिवारिक पृष्ठभूमि

विद्यासागर जी के पिता श्रीमान् मालिकचन्द्र जी थे, जो डाक विभाग में कार्यरत थे। वे आर्यसमाजी विचारों से ओतप्रोत थे और गुरुकुलों के पुनरुद्धार में सक्रिय भागीदार थे। वे अपने चार पुत्रों और एक पुत्री के साथ एक आदर्श आर्य समाजी परिवार के स्वामी थे।


  1. शिक्षा और व्यक्तित्व का विकास

विद्यासागर जी की शिक्षा की शुरुआत आर्य समाज के गुरुकुलों से हुई। उन्होंने गुरुकुल कमालिया और गुरुकुल रायकोट जैसे संस्थानों में रहकर वैदिक शिक्षा प्राप्त की। गुरुकुल जीवन ने उन्हें दृढ़ विचार, शारीरिक सौष्ठव, और आत्मनिर्भरता सिखाई। बाद में संगीत के प्रति रुचि के चलते उन्हें संगीत महाविद्यालय, जालंधर में भेजा गया, जहाँ उन्होंने भगत मंगतराम जी से संगीत की शिक्षा प्राप्त की।


  1. स्वावलम्बन एवं प्रचार कार्य

संगीत में पारंगत होकर विद्यासागर जी ने पटियाला आर्य समाज के अंतर्गत कार्य किया। उनका उद्देश्य स्वतन्त्र रूप से प्रचार कार्य करना था। हरिद्वार के कुम्भ मेले का दर्शन कर वे रावलपिंडी पहुँचे जहाँ उन्हें 40 रुपये मासिक की आय मिलने लगी। वे समाजसेवा और प्रचार के लिए सदैव तत्पर रहते थे।


  1. व्यक्तित्व की विशेषताएँ

विद्यासागर जी तेजस्वी, हंसमुख, साहसी और सरल स्वभाव के युवक थे। वे डील-डौल में बड़े मजबूत थे और आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे। पहाड़ी रास्तों पर भी साइकिल से निर्भीकता से चलना, सामाजिक कार्यों में भाग लेना और सत्य के लिए खड़े होना उनके जीवन के स्वाभाविक गुण थे।


  1. मंदिर निर्माण में योगदान

ग्राम आड़ा में मंदिर निर्माण हेतु उन्होंने प्रभावशाली भजन प्रस्तुत किया, जिसका एक भाव था—
“मंदिर बनाने में यदि गारा बनाने के लिए पानी न मिले, तो मेरा खून डाल देना।”
उनका यह त्यागमय उद्बोधन वहां उपस्थित जनसमूह की आंखों में आँसू ले आया और मंदिर निर्माण के लिए जनसमर्थन उमड़ पड़ा।


  1. शहादत की पृष्ठभूमि

एक दिन अपने भाई श्री देवेन्द्रनाथ जी के साथ “प्रयाण चश्मा” नामक स्थान पर स्नान के लिए गए। वहीं एक मुस्लिम स्त्री ‘होता’ ने पहले गालियाँ दीं, फिर विद्यासागर जी पर हमला कर दिया। ‘हबीब गोलड़ा’ नामक पुरुष ने उनका हाथ पकड़ा और उसी स्त्री ने छुरे से उनकी छाती में वार कर दिया।


  1. घायल अवस्था और सरकारी उपेक्षा

घायल अवस्था में विद्यासागर जी को समय पर उचित उपचार नहीं मिला। डाक्टरों की उपेक्षा और सरकारी तंत्र की लापरवाही के कारण उनकी हालत बिगड़ती गई। अंततः १६ अप्रैल १९३६ को प्रातः ८ बजे, अपनी माता की गोद में उन्होंने अंतिम साँस ली।


  1. अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि

पिंडदादनखान में आर्य समाज के कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी माँ ने फूलों की माला उनके शव पर अर्पित की और उसे अग्नि को समर्पित किया गया।


  1. उपसंहार

विद्यासागर जी का जीवन बलिदान, साहस और सामाजिक जागरण की अमिट छाप है। उन्होंने न केवल धार्मिक सहिष्णुता के अधिकार की रक्षा की, बल्कि अपने जीवन को आर्य समाज और राष्ट्रहित में समर्पित कर दिया। उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि सच्चाई के लिए खड़ा होना कभी व्यर्थ नहीं जाता।


“शहीद विद्यासागर अमर रहें!”
“आर्य समाज के इस अमर सपूत को शत-शत नमन!”