“धर्मान्नास्त्यपरः सुहृद् भवभृताम्”
(धर्म से बढ़कर संसारवासियों का कोई और हितैषी नहीं।)
परिचय
श्री पाण्डुरंग जी हैदराबाद राज्य के उस्मानाबाद जनपद के निवासी थे। उनका शरीर अत्यंत हृष्ट-पुष्ट और तेजस्वी था। मात्र 22 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने धार्मिक अधिकारों और आत्मगौरव की रक्षा हेतु आर्य समाज के नेतृत्व में आरंभ हुए सत्याग्रह में भाग लिया।
गुलबर्गा जेल की पीड़ा और बीमारी
सत्याग्रह के कारण उन्हें गुलबर्गा जेल में रखा गया, जहाँ अमानवीय परिस्थितियों में उन्हें इन्फ्लुएंज़ा हो गया। उचित चिकित्सा के अभाव में उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई। 25 मई 1939 को जब उनकी अवस्था अत्यंत नाजुक हो गई, तब प्रशासन ने उन्हें सिविल अस्पताल भेजा।
बलिदान का क्षण
दुर्भाग्यवश, उपचार के अभाव और समय पर ध्यान न देने के कारण 27 मई 1939 को उन्होंने वहीं अस्पताल में अंतिम साँस ली। यह केवल एक युवा की मृत्यु नहीं थी, अपितु अन्याय के विरुद्ध धर्म की राह पर चलते हुए दिया गया पवित्र बलिदान था।
जनता का आक्रोश और प्रशासन का अन्याय
नगर में जब यह दुःखद समाचार फैला, तो सैकड़ों की भीड़ उनके अंतिम दर्शन के लिए अस्पताल पहुँच गई। परंतु निजाम प्रशासन ने न शव सौंपा, न ही किसी को उसे देखने या उसका चित्र लेने दिया। शव को पुनः जेल भेजा गया और वहाँ से कुछ सत्याग्रहियों की उपस्थिति में पुलिस द्वारा गुप्त रूप से श्मशान भूमि ले जाकर अन्त्येष्टि कर दी गई।
निजामशाही की स्वीकृति
5 जुलाई को निजाम सरकार ने औपचारिक रूप से श्री पाण्डुरंग जी के देहांत को स्वीकार किया। लेकिन तब तक यह बलिदान धर्म और स्वातंत्र्य की चिरस्मरणीय गाथा बन चुका था।
श्री पाण्डुरंग जी की यह आहुति इतिहास के पृष्ठों पर अंकित एक अमर अध्याय है, जो आज भी हमें प्रेरणा देता है कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए कोई भी बलिदान बड़ा नहीं होता।










