गोधरा में हिन्दुओं की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो गयी थी। हिन्दू घरों में गोमांस फेंकना, देवमन्दिरों में बीड़ी पीना, गाली-गलौच करना, स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार करना, विवाहादि में विघ्न डालना, कीर्तन की मण्डलियों को पत्थर मारना, मूर्तियों पर थूकना, इत्यादि बातों की गिनती नहीं थी। और तो और गोधरा के नगरपालिक में प्रतिवर्ष लाखों रुपये की रक़म हिन्दुओं के द्वारा भरे जाने पर भी हिन्दू बहुल शहर की नगरपालिका में एक भी हिन्दू न था।
हिन्दुओं का संगठित प्रयास
उस समय हिन्दुओं में संगठन करने की विशेष भावना हो गई थी। श्री पुरुषोत्तमदास मगनलाल शाह के नेतृत्व में हिन्दुओं की एक समिति बनी और इन्होंने हर अत्याचार का विरोध आरम्भ कर दिया। तालाबों में चीलर (गोबर) डालने से मना कर दिया। क्योंकि वह पानी पीने के काम में आता था। फिर उस पानी से मल धोना क्यों?
संघर्ष की शुरुआत
नगरपालिका को जब सूचित किया गया तो उन्होंने उत्तर दिया – ‘‘हम क्या कर सकते हैं?’’ अन्त में एक दिन ऐसा भी आया जब सरकारी कर्मचारी ने चीलर डालना आरम्भ किया और उसे डलवाने के लिए स्वयं सब इन्स्पैक्टर और पुलिस वाले वहाँ आ गये।
पुरुषोत्तमदास जी की बहादुरी
पुरुषोत्तमदास शाह स्वयं कुछ मित्रों के साथ वहाँ पहुँचे और एक व्यक्ति को चीलर डालते देखा तो उसे पकड़ लिया। पीछे से एक पुलिस वाला दौड़ा और पुरुषोत्तमदास जी पर वार किया। पुरुषोत्तमदास जी ने बड़ी फुर्ती से उसका डंडा पकड़ लिया। इतने में और पुलिस वाले दौड़े और सबने मिलकर पुरुषोत्तमदास को पकड़कर बुरी तरह पीटा। एक ने लात मारी और वे गिर पड़े। फिर सब डंडों से पीटने लगे और अन्त में एक डंडा सिर पर मारा जिससे खून की धारा बह निकली।
शाहदत और सम्मान
अवस्था चिन्ताजनक होने पर अस्पताल लाया गया और वहाँ शहीद हो गए। हिन्दू धर्म और हिन्दू जाति की रक्षा के लिए इस नये शहीद ने अपने प्राणों की आहुति दी। इसके पश्चात् हजारों नर-नारियों ने पुरुषोत्तमदास जी की शवयात्रा में भाग लिया और फूलों की वर्षा कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
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