शहीद घुन्नासिंह जी

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शहीद घुन्नासिंह जी का जीवन परिचय
(एक निर्भीक, धर्मनिष्ठ और समाजसेवी आर्यवीर)


नाम: शहीद घुन्नासिंह जी
जन्म: संवत् 1938 विक्रमी (सन् 1881 ईस्वी)
जन्म स्थान: ग्राम लताला, जिला लुधियाना, पंजाब
पिता का नाम: श्री थम्मणसिंह जी
माता का नाम: श्रीमती भागण देवी
पत्नी का नाम: श्रीमती जयकौर देवी (शेरसिंह जी की सुपुत्री, ग्राम बुरज लिटा)


प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा

शहीद घुन्नासिंह जी का जन्म लुधियाना जिले के लताला ग्राम में हुआ, जो खंगूड़े जाटों का निवास स्थान है। वे अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थे। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें गुरुमुखी पढ़ने हेतु एक उदासी साधु के पास भेजा गया। किंतु अल्प समय पश्चात पारिवारिक कारणों से शिक्षा रुक गई।

13 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हुआ तथा 14वें वर्ष में गौणा सम्पन्न हुआ। घुन्नासिंह जी कृषिपरिवार से थे, और बाल्यकाल से ही खेती में दक्षता प्राप्त की। उनके परिवार को गाँव में एक कुशल कृषक परिवार के रूप में जाना जाता था।


वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन

घुन्नासिंह जी को कुल छह संतानें हुईं – चार पुत्र और दो कन्याएँ। उनका ज्येष्ठ पुत्र भजनसिंह लुधियाना के आर्य स्कूल में अध्ययन करता था, पर दुर्भाग्यवश 18 वर्ष की अवस्था में उसका निधन हो गया। अन्य पुत्रों के नाम – बस्तावरसिंह, सुखदेव और बलभद्र थे। बड़ी कन्या का विवाह वैदिक रीति से डॉक्टर इन्द्रसिंह से हुआ, जो बुरज नकलीया ग्राम के निवासी थे। दूसरी कन्या अल्पायु में ही स्वर्गवासी हो गई।


आर्यसमाजी जीवन की शुरुआत

प्रारंभ से ही वे धार्मिक प्रवृत्ति के थे। उनकी संगति पं० यमुनादास जी और पं० विष्णुदास जी जैसे विद्वान उदासी साधुओं से हुई। इन दोनों महानुभावों ने आर्यसमाज के सिद्धांतों को अपनाया और घुन्नासिंह जी को भी वैदिक मार्ग की ओर प्रवृत्त किया। परिणामस्वरूप उन्होंने नागरी लिपि सीखी, हिन्दी पढ़ी और वैदिक साहित्य का अध्ययन आरम्भ किया।

जब उनकी पूज्या माता का देहान्त हुआ, तब उन्होंने किसी पौराणिक क्रिया-कर्म का आयोजन नहीं किया – इस कारण गाँव में यह सर्वविदित हो गया कि अब वे आर्यसमाजी बन चुके हैं। वे सदा सादा जीवन, उच्च विचार के पथ पर चलते रहे।


सामाजिक कार्य एवं कन्या शिक्षा का समर्थन

घुन्नासिंह जी नारी शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे। जब गाँव में कन्या पाठशाला खोलने का प्रस्ताव आया तो अकालियों और आर्यसमाजियों के बीच मतभेद उत्पन्न हुए। समझौते के असफल रहने पर घुन्नासिंह जी ने स्त्री अध्यापिका के नेतृत्व में अलग पाठशाला खोली जो आगे चलकर डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अधीन हो गई और आज भी मिडिल स्कूल के रूप में संचालित है। उनका यह कार्य सामाजिक सुधार की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था।


वैदिक विवाह का उदाहरण

उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह वैदिक विधि से सम्पन्न किया। पंडित न आने की स्थिति में पं० विष्णुदास जी ने वैदिक मंत्रों से विवाह सम्पन्न कराया। इस विवाह में मात्र चार लोग बारात में आये – वर, उसका भाई, नाई और गाड़ीवान। न कोई दहेज दिया गया, न कोई आडम्बर किया गया। इस उदाहरण ने ग्रामवासियों को गहरे रूप से प्रभावित किया।


शहादत – आर्यसमाज के लिए प्राणोत्सर्ग

आर्यसमाज और कन्या शिक्षा में सक्रियता के कारण अकालियों से उनका मतभेद गहरा गया। विरोध इतना बढ़ा कि उनकी हत्या का षड्यन्त्र रच डाला गया। एक दिन जब वे प्रातःकाल दुकान पर गये, तभी कुछ षड्यन्त्रकारियों ने उन्हें पकड़ लिया और अपने घर में ले जाकर डण्डों और लाठियों से निर्मम प्रहार किये। जब लोग पहुंचे तो वे गंभीर रूप से घायल अवस्था में थे।

उन्हें तत्काल डेहलों थाने ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने शांतिपूर्वक अपने प्राण त्याग दिये। उनके अंतिम शब्द थे –
“ज्वालासिंह, देख ले… आंखों में आंसू नहीं हैं।”


न्याय की विजय

उनके हत्यारों में से एक वचनसिंह को फाँसी की सज़ा हुई। जस्टिस जयलाल ने फैसले में स्पष्ट लिखा –
“वचनसिंह का व्यवहार किसी अनुकम्पा के योग्य नहीं है… मृत्यु की आज्ञा उसके लिये पूर्णतः उपयुक्त है।”


गुण व व्यक्तित्व

धैर्यशील: पुत्र की मृत्यु पर भी उन्होंने संयम और विवेक का परिचय दिया।

दृढ़ निश्चयी: समाज के विरोध और कठिनाइयों में भी अपने आर्य सिद्धांतों से कभी विचलित नहीं हुए।

धर्मप्रेमी: वेद-धर्म के प्रचार हेतु जीवन समर्पित किया और अंततः बलिदान दिया।


निष्कर्ष

शहीद घुन्नासिंह जी का जीवन एक ऐसे आर्य वीर का जीवन है जो ना केवल स्वयं वैदिक विचारों का पालन करता था, बल्कि समाज में जागरूकता फैलाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहा। उन्होंने कन्या शिक्षा, धार्मिक सुधार और सामाजिक समानता जैसे कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाई। उनका बलिदान आर्यसमाज के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

वे केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक विचार, एक आंदोलन और एक प्रेरणा हैं।