🕊 शहीद देवकीनन्दन जी – प्रेम, साहस और धर्मरक्षा का प्रतीक 🕊
“प्रायः परोपतापाय दुर्जनः सततोद्यतः।
अवश्यकरणीयत्वान्न कारणमपेक्षते।।”
दुर्जन सदा परपीड़ा में तत्पर रहता है। धर्म की राह पर चलने वालों के लिए समाज में विघ्न पड़ना नया नहीं, परंतु जिनका साहस सत्य से अनुप्राणित होता है, वे युगों तक स्मरण किए जाते हैं।
📍 जन्म और परिचय
देवकीनन्दन, उपनाम बुग्गा, कक्कड़ जाति से संबंधित एक नवयुवक थे। उनका जन्म जिला कैम्बलपुर, तहसील पिण्डीचेर के मखडू ग्राम में हुआ। इनके पिता का नाम श्री नत्थूराम जी था। उनका शरीर सुंदर, सुडौल और व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था।
❤ प्रेम और वैदिक विवाह
देवकीनन्दन जी का प्रेम एक मुस्लिम कन्या, जो सैय्यद जाति की थी, से हो गया। यह प्रेम सामाजिक सीमाओं से ऊपर था। प्रेम को पवित्र रूप देने हेतु उस कन्या ने वैदिक धर्म अंगीकार किया और दोनों ने वैदिक रीति से विवाह कर लिया।
इस विवाह की चर्चा धीरे-धीरे नगर भर में फैल गई और कट्टरपंथियों की आँखों की किरकिरी बन गई।
🔥 उत्तेजना और हत्या
पीर गुलाम अब्बास शाह, एक मुस्लिम धार्मिक अगुआ, ने जनसभा करके भीड़ को उकसाया और कहा कि एक हिन्दू युवक ने सैय्यद मुसलमान कन्या से विवाह कर धर्म का अपमान किया है। यह भाषण इतनी उत्तेजना से भरा था कि भीड़ उन्मादी हो उठी।
उन्होंने देवकीनन्दन के घर को घेर लिया, पर वे वहाँ नहीं थे। उन्हें सिन्ध नदी की ओर जाते देख लोगों ने मार्ग में घेर कर बेरहमी से हत्या कर दी।
⚖ न्याय का अभाव
यद्यपि हत्या का मुकदमा चला, परंतु पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण सभी आरोपी छूट गये। यह उस समय की न्यायिक असमर्थता और कट्टरता का चित्रण है।
🌼 श्रद्धांजलि
देवकीनन्दन जी का जीवन बताता है कि प्रेम, साहस और धर्म के लिए दी गई आहुति कभी व्यर्थ नहीं जाती। वे युवाओं के लिए प्रेरणा हैं जिन्होंने सत्य और सच्चे प्रेम के लिये प्राण त्यागे।
“धर्मांतरण नहीं, धर्मग्रहण और प्रेममय विवाह ही सच्चा शुद्धिकरण है।”










