सेठ रामदास जी गुड़ वाले

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जिसके महलों की दीवारें सोने से जड़ी थीं, जिसके खजानों की मिसालें पूरे हिंदुस्तान में दी जाती थीं, वह व्यक्ति जब देश पर संकट आया, तो बिना एक पल सोचे अपना सब कुछ मातृभूमि पर वार गया। नाम था सेठ रामदास जी गुड़वाले।

एक ऐसा वीर, जिसने न सिर्फ अपनी दौलत, बल्कि अपनी जान भी भारत को आजाद करने की लड़ाई में कुर्बान कर दी। अंग्रेजों को उनकी देशभक्ति इतनी चुभी कि फांसी से पहले उन्हें खंभे से बांधकर भूखे शिकारी कुत्तों के सामने छोड़ दिया गया। जिंदा ही नोच डाला गया और फिर उस अधमरे शरीर को चौक में फांसी पर टांग दिया गया ताकि बाकी हिंदुस्तान डर जाए। लेकिन क्या हम आज भी उस बलिदान को याद करते हैं?

1857 की क्रांति जब दिल्ली पहुँची, तब देशभक्ति की एक मिसाल बनकर उभरे सेठ रामदास जी गुड़वाले। दिल्ली के एक समृद्ध अग्रवाल परिवार में जन्मे रामदास जी एक अरबपति व्यापारी और बैंकर थे। कहा जाता था कि उनके पास इतना सोना-चांदी और जवाहरात था कि उसकी दीवारों से गंगा का पानी भी रोका जा सकता था।जब मेरठ से शुरू हुई स्वतंत्रता की चिंगारी दिल्ली पहुँची और दिल्ली में देशी सेनाएं एकत्र होने लगीं, तो भोजन और वेतन की समस्या खड़ी हो गई। सेठ रामदास जी बादशाह बहादुरशाह जफर के निकट थे। उन्होंने राजा की हालत देखकर अपनी पूरी संपत्ति देश पर न्योछावर कर दी और कहा- मातृभूमि की रक्षा होगी तो धन फिर कमा लेंगे।रामदास जी ने सिर्फ धन नहीं दिया। सत्तू, आटा, अनाज, बैल, ऊँट, घोड़ों के चारे से लेकर सेना-खुफिया तंत्र तक, का इंतजाम खुद किया। उन्होंने पूरे उत्तर भारत में जासूसी नेटवर्क खड़ा कर दिया। देश के कोने-2 में मनसब दारों और राजाओं से संपर्क कर उन्हें संगठित करने लगे।अंग्रेज हैरान थे कि एक व्यापारी इतनी रणनीति कैसे रच सकता है। जब उन्होंने चाँदनी चौक में जहरीली शराब की पेटियाँ रखवाकर अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया,तब अंग्रेजों को यकीन हो गया कि अगर भारत पर राज करना है, तो पहले रामदास को खत्म करना होगा।अंततः एक दिन उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया। फिर जो किया गया वो हैवानियत से भी परे था। उन्हें एक खंभे से बाँध दिया गया और उन पर भूखे शिकारी कुत्ते छोड़ दिए गए। वे जीवित ही शरीर से नोचे गए। फिर भी संतोष नहीं हुआ तो उन्हें अधमरी अवस्था में दिल्ली के चाँदनी चौक की कोतवाली के सामने फांसी पर लटका दिया गया।इतिहासकार ताराचंद ने अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट’ में लिखा- ‘सेठ रामदास उत्तर भारत के सबसे अमीर सेठ थे, लेकिन अंग्रेजों को उनके धन से ज्यादा उनके संकल्प से डर लगता था।

आज इतिहास में उनका नाम शायद कहीं दर्ज नहीं, लेकिन आजादी के हर फूल में उनके खून की एक बूंद शामिल है। तुम न समझो देश को आजादी यूं ही मिली है। हर कली इस बाग की कुछ खून पीकर ही खिली है। मिट गए वतन के वास्ते, दीवारों में जो गड़े हैं। महल अपनी आजादी के,शहीदों की छातियों पर ही खड़े हैं।